दवा ₹120 की और MRP ₹1,300! सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को कड़ी फटकार: ‘इतने सालों से क्या कर रही थी सरकार?’

देश में गंभीर बीमारियों से जूझ रहे करोड़ों मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहे निजी फार्मा कंपनियों के बेलगाम मुनाफे पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट में जीवनरक्षक दवाओं के अत्यधिक अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और कंपनियों द्वारा वसूले जाने वाले अनुचित ट्रेड मार्जिन के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य पीठ ने केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैये पर गहरी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने ऐसे चौंकाने वाले दस्तावेज और आंकड़े पेश किए गए, जहां कैंसर, हृदय रोग और गंभीर संक्रमणों में इस्तेमाल होने वाली जिन दवाओं की वास्तविक निर्माण और खरीद लागत मात्र ₹120 से ₹150 बैठती है, उन पर दवा निर्माता कंपनियां ₹1,200 से लेकर ₹1,300 तक का एमआरपी छापकर खुले बाजार में बेच रही हैं। इस पर जस्टिस की बेंच ने सरकार की खिंचाई करते हुए सीधा सवाल दागा कि जब गरीब और मध्यमवर्गीय जनता दवाओं के भारी बिल के नीचे दबकर कर्जदार हो रही है, तब सरकार इतने वर्षों से इस ट्रेड मार्जिन पर लगाम लगाने के लिए क्या कर रही थी?
शीर्ष अदालत की दो टूक: 'स्वास्थ्य का अधिकार सिर्फ अमीरों की बपौती नहीं हो सकता'
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त 'जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार' (Right to Health) का हवाला देते हुए कहा कि किफायती दरों पर जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध कराना किसी भी कल्याणकारी राज्य की पहली संवैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने टिप्पणी की कि जब कोई मरीज अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता है, तो उसके तीमारदार के पास केमिस्ट द्वारा मांगे गए मनमाने पैसे चुकाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। बेंच ने सरकार से कड़े शब्दों में पूछा कि क्या अधिकारियों को इस बात का अहसास है कि दवाओं पर 800% से 1000% तक का ट्रेड मार्जिन रखना आम जनता के साथ सीधा खिलवाड़ और शोषण है? अदालत ने मौखिक रूप से दर्ज किया कि नीतिगत बैठकों और समितियों के गठन के नाम पर दशकों से फाइलों को इधर से उधर घुमाया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर मरीजों को कोई ठोस कानूनी राहत नहीं मिल पाई है।
क्या है ट्रेड मार्जिन का खेल और कैसे तय होता है दवाओं का मनमाना एमआरपी?
दवा उद्योग में दवाओं की कीमतों का पूरा ढांचा मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बंटा हुआ है:
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शेड्यूल्ड दवाएं (Scheduled Drugs): राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (NLEM) के तहत आने वाली लगभग 900 से अधिक दवाएं, जिनकी अधिकतम कीमत (सीलिंग प्राइस) नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) द्वारा 'ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर' (DPCO) के जरिए तय की जाती है। इन दवाओं पर कंपनियां मनमाना रेट नहीं बढ़ा सकतीं।
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गैर-शेड्यूल्ड दवाएं (Non-Scheduled Drugs): देश के कुल दवा बाजार का लगभग 80% हिस्सा गैर-शेड्यूल्ड और ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं का है। मौजूदा नियमों के अनुसार, इन दवाओं पर सरकार का कोई सख्त प्राइस कैप नहीं है; कंपनियां साल में अधिकतम 10% तक कीमत बढ़ाने के लिए स्वतंत्र हैं।
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मार्जिन का खुला खेल: फार्मा कंपनियां थोक विक्रेताओं (Wholesalers), वितरकों (Stockists) और अस्पतालों को आकर्षित करने के लिए दवा का एक्स-फैक्ट्री प्राइस (लागत) तो ₹100 या ₹120 रखती हैं, लेकिन उस पर प्रिंटेड एमआरपी ₹1,300 डाल देती हैं। इसके बाद अस्पताल या मेडिकल स्टोर संचालक थोक में ₹150 में दवा खरीदकर मरीज को पूरे ₹1,300 में बेचते हैं। बीच का ₹1,150 का शुद्ध मुनाफा अस्पताल, डिस्ट्रीब्यूटर और बिचौलियों की जेब में जाता है।
ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन (TMR) की सिफारिशें वर्षों से धूल क्यों फांक रही हैं?
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया कि सरकार ने खुद वर्ष 2016 और उसके बाद भी फार्मा सेक्टर में 'ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन' (TMR) को लेकर कई उच्चस्तरीय टास्क फोर्स और विशेषज्ञ समितियां गठित की थीं।
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समितियों की सिफारिश: इन सरकारी समितियों ने स्पष्ट सिफारिश की थी कि गैर-शेड्यूल्ड जीवनरक्षक दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को पहले बिंदु (First Point of Sale) से अंतिम उपभोक्ता तक अधिकतम 30% से 50% के दायरे में सीमित (Cap) कर दिया जाना चाहिए।
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कैंसर दवाओं में दिखा था असर: जब सरकार ने कुछ वर्ष पूर्व पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 42 गैर-शेड्यूल्ड एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30% पर कैप किया था, तो उन दवाओं की एमआरपी में 85% से 90% तक की भारी गिरावट आई थी और मरीजों के सैकड़ों करोड़ रुपये बचे थे।
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अन्य दवाओं पर रोक क्यों नहीं: अदालत ने पूछा कि जब कैंसर की दवाओं में यह फॉर्मूला पूरी तरह सफल रहा, तो डायबिटीज, बीपी, किडनी, लिवर और एंटीबायोटिक जैसी आम जीवनरक्षक दवाओं पर इसे पूरे देश में अनिवार्य रूप से लागू करने में सरकार को इतने साल क्यों लग गए?
केंद्र सरकार का पक्ष: संतुलन साधने और इनोवेशन को बचाने का तर्क
केंद्र सरकार की ओर से पेश विधि अधिकारियों ने अदालत को आश्वस्त करने का प्रयास किया कि सरकार दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए लगातार प्रयासरत है और प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (Jan Aushadhi Kendras) के जरिए देश भर में 50% से 90% सस्ती जेनेरिक दवाएं मुहैया कराई जा रही हैं। सरकार ने दलील दी कि भारत दुनिया की फार्मेसी है और देश में लाखों लोगों को रोजगार देने वाले फार्मास्युटिकल सेक्टर में मूल्य नियंत्रण लागू करते समय दवा निर्माण की गुणवत्ता, कच्चे माल (API) की अंतरराष्ट्रीय लागत और नए शोध (R&D) में लगने वाले भारी निवेश को भी ध्यान में रखना पड़ता है। यदि बहुत कठोर मूल्य सीमा लगाई गई, तो कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां जरूरी दवाओं का भारत में निर्माण या आपूर्ति बंद कर सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा निर्देश: ठोस एक्शन प्लान पेश करे सरकार
सरकार के स्पष्टीकरण से पूरी तरह असंतुष्ट नजर आई शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया कि व्यापारिक मुनाफाखोरी कभी भी आम नागरिक के स्वास्थ्य से ऊपर नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (फार्मास्युटिकल विभाग) और एनपीपीए को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे ट्रेड मार्जिन को युक्तिसंगत बनाने और गैर-शेड्यूल्ड दवाओं के एमआरपी पर कानूनी लगाम कसने के लिए एक समयबद्ध और ठोस कार्ययोजना (Comprehensive Action Plan) अदालत के समक्ष दाखिल करें। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि सरकार नीतिगत स्तर पर शीघ्रता से कदम नहीं उठाती है, तो सुप्रीम कोर्ट को जनहित में सीधे हस्तक्षेप करते हुए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।