दुनिया को दांत देने वाला देश, जिसे घूमने में लगता है सिर्फ आधा घंटा

दुनिया के नक्शे पर एक ऐसा बेहद छोटा और अनोखा देश मौजूद है जिसे पूरा घूमने में एक पर्यटक को सिर्फ आधा घंटा लगता है। लेकिन अपनी भौगोलिक सीमाओं से परे, यह देश दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले नकली दांतों (Dental Prosthetics) का सबसे बड़ा निर्यातक माना जाता है। हम बात कर रहे हैं यूरोप के अलपाइन पहाड़ों के बीच बसे खूबसूरत देश 'लिकटेंस्टीन' (Liechtenstein) की। हाल ही में लिकटेंस्टीन के क्राउन प्रिंस और उनके उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के भारत आगमन पर जिस तरह से राष्ट्रपति भवन और विदेश मंत्रालय द्वारा उनका शाही और ऐतिहासिक स्वागत किया गया, उसने वैश्विक कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। एक इतने छोटे देश के क्राउन प्रिंस के स्वागत में भारत सरकार द्वारा बिछाया गया यह रेड कार्पेट केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच उभरते गहरे आर्थिक, वित्तीय और सामरिक हितों का पुख्ता प्रमाण है।
कौन सा है यह अनोखा देश लिकटेंस्टीन और कैसे बना दुनिया को 'दांत देने वाला देश'?
ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड के बीच स्थित लिकटेंस्टीन दुनिया का छठा सबसे छोटा देश है, जिसका कुल क्षेत्रफल महज 160 वर्ग किलोमीटर है। इस देश की आबादी लगभग 40 हजार है और इसे पैदल या गाड़ी से आधे घंटे के भीतर पार किया जा सकता है। लेकिन आकार में इतना छोटा होने के बावजूद यह देश आर्थिक और औद्योगिक मामले में बेहद शक्तिशाली है। लिकटेंस्टीन की मशहूर कंपनी 'इवोकलार विवाडेंट' (Ivoclar Vivadent) दुनिया भर में सबसे प्रीमियम और उच्च गुणवत्ता वाले नकली दांतों, डेंटल सेरामिक्स और ओरल हेल्थकेयर प्रॉडक्ट्स का निर्माण करती है। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले लाखों डेंटल क्राउन और डेंचर यहीं से तैयार होकर एक्सपोर्ट किए जाते हैं। यही वजह है कि इसे आम बोलचाल में 'दुनिया को दांत देने वाला देश' कहा जाता है।
भारत में लिकटेंस्टीन के प्रिंस का इतना भव्य और शाही स्वागत क्यों?
जब लिकटेंस्टीन के क्राउन प्रिंस एलोइस (Crown Prince Alois) भारत की आधिकारिक यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे, तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने उनका पारंपरिक और शाही अंदाज में स्वागत किया। इस भव्य आगवानी के पीछे का मुख्य कारण दोनों देशों के बीच तेजी से मजबूत होते आर्थिक और व्यापारिक संबंध हैं। भारत और 'यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ' (EFTA) के बीच हुए ऐतिहासिक व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) में लिकटेंस्टीन की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस समझौते के तहत लिकटेंस्टीन, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और आइसलैंड जैसे EFTA देश आने वाले वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर (100 Billion Dollars) का भारी-भरकम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) करने जा रहे हैं। यही वजह है कि भारत ने अपने इस प्रमुख यूरोपीय आर्थिक साझेदार का इतना अभूतपूर्व स्वागत किया।
बैंकिंग, टैक्स हेवन और हाई-टेक विनिर्माण का सबसे बड़ा केंद्र
लिकटेंस्टीन केवल प्राकृतिक सुंदरता या डेंटल प्रॉडक्ट्स के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे सुरक्षित बैंकिंग सेक्टर और वेल्थ मैनेजमेंट हब के रूप में भी जाना जाता है। प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) के मामले में यह देश दुनिया के शीर्ष पायदानों पर शुमार है। यहाँ का टैक्स स्ट्रक्चर और गोपनीयता नियम दुनिया भर के निवेशकों को आकर्षित करते हैं। भारत और लिकटेंस्टीन के बीच अब वित्तीय पारदर्शिता, दोहरे कराधान से बचाव (DTAA) और एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग मानकों पर मजबूत सहयोग स्थापित हो चुका है। भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था, मेक इन इंडिया और ऑटोमेशन सेक्टर में लिकटेंस्टीन की कंपनियां बड़े पैमाने पर निवेश करने की रणनीति बना रही हैं, जिससे भारतीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
पर्यटन, पर्यावरण और भविष्य की साझेदारी पर दोनों देशों का साझा विजन
लिकटेंस्टीन के क्राउन प्रिंस की इस भारत यात्रा के दौरान केवल व्यापार ही नहीं, बल्कि हरित ऊर्जा (Green Energy), स्थिरता और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में भी कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। आल्प्स पर्वत श्रृंखला में बसे इस देश के पास इको-टूरिज्म और पर्यावरण संरक्षण की उन्नत तकनीकें हैं, जिनका लाभ भारत अपने पर्वतीय राज्यों के विकास में उठा सकता है। वहीं दूसरी ओर, भारतीय पर्यटकों के लिए यूरोप के इस अनदेखे और बेहद खूबसूरत देश के दरवाजे और अधिक सुगमता से खुलेंगे। भारत का यह कूटनीतिक कदम यह साबित करता है कि नई दिल्ली की विदेश नीति में देश का आकार नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ने वाले रणनीतिक और आर्थिक हित मायने रखते हैं, जिसने लिकटेंस्टीन जैसे छोटे देश को भी भारत का एक बेहद खास दोस्त बना दिया है।