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‘शीघ्र सुनवाई एक मौलिक अधिकार है’, सुप्रीम कोर्ट की दो टूक- कोई भी कानून और नियम देश के संविधान से ऊपर नहीं

भारतीय न्यायव्यवस्था और संवैधानिक इतिहास के पन्नों में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सामने आया है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का संविधान ही देश का सर्वोच्च कानून है और इससे ऊपर कोई भी विशेष कानून, नियम या वैधानिक उपबंध नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट की एक महत्वपूर्ण बेंच ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया है कि 'त्वरित या शीघ्र सुनवाई' (Speedy Trial) का अधिकार हर नागरिक का एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है, और यदि किसी विशेष कानून के प्रावधान इस मूल अधिकार के आड़े आते हैं, तो ऐसी स्थिति में संविधान की सर्वोच्चता ही सर्वोपरि मानी जाएगी। इस फैसले के बाद देश की न्यायिक प्रणाली और विशेष कानूनों के तहत विचाराधीन कैदियों की जमानत के मामलों में एक नया और बड़ा मोड़ आ गया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने अपने फैसले में किन महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं को रेखांकित किया है।

संविधान सभी कानूनों से ऊपर, विशेष कानूनों और संविधान में टकराव पर संविधान ही होगा प्रभावी

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुयान और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की बेंच ने सुनवाई के दौरान एक बहुत ही स्पष्ट और कड़ा संदेश देते हुए कहा कि देश का संविधान किसी भी परिस्थिति में सभी सामान्य और विशेष कानूनों से ऊपर है। अक्सर यह देखा जाता है कि नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉफिक सब्सटेंसेस (NDPS) एक्ट, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) जैसे सख्त और विशेष कानूनों के प्रावधानों का हवाला देकर आरोपियों को लंबे समय तक जेल में रखने की दलीलें दी जाती हैं।

अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि इन विशेष कानूनों के किसी भी नियम या प्रावधान के साथ संविधान के मूलभूत सिद्धांतों का विरोधाभास या टकराव पैदा होता है, तो ऐसी स्थिति में केवल और केवल संविधान के प्रावधान ही प्रभावी होंगे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान की व्याख्या कभी भी किसी विशेष कानून के आधार पर नहीं की जानी चाहिए, बल्कि हमेशा हर कानून की वैधता और व्याख्या संविधान की कसौटी पर ही की जानी चाहिए। कोई भी वैधानिक कानून संविधान के दायरे से बाहर जाकर नागरिकों के मूल अधिकारों को सीमित नहीं कर सकता।

अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार संवैधानिक न्यायशास्त्र के मूल में

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत मिलने वाला 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार' केवल कोई साधारण संवैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे संवैधानिक न्यायशास्त्र (Constitutional Jurisprudence) का मूल आधार है। अदालत ने बहुत ही सख्त लहजे में यह टिप्पणी की कि इन मौलिक अधिकारों के साथ किसी भी रूप में हल्के ढंग से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता, चाहे वह मामला किसी भी गंभीर या विशेष कानून के तहत ही क्यों न दर्ज किया गया हो।

बेंच ने अपने ही पहले के एक पूर्व आदेश पर भी सवाल उठाया और उसकी समीक्षा की, जिसमें यह कहा गया था कि एनडीपीएस जैसे विशेष कानूनों के मामलों में आरोपी को अनुच्छेद 21 का लाभ उठाने के लिए उस कानून की धारा 37 की सख्त और कठिन शर्तों के दायरे में ही रहना होगा, और केवल मुकदमे में अत्यधिक देरी हो जाने के आधार पर धारा 37 के प्रावधानों को ओवरराइड नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की इस नई बेंच ने साफ कर दिया कि न्याय में मिलने वाली अनावश्यक देरी किसी भी नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन करती है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

त्वरित सुनवाई का अधिकार जमानत का बन सकता है आधार, ट्रायल में देरी पर उठे सवाल

हाल के दिनों में पीएमएलए, एनडीपीएस और यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के तहत दर्ज मामलों में अदालती ट्रायल में होने वाली लंबी देरी और उसके आधार पर जमानत दिए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों के बीच अलग-अलग विचार और मतभेद सामने आते रहे हैं। कुछ अदालती बेंचों का यह रुख था कि विशेष कानूनों के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार स्वतः ही जमानत का आधार नहीं बन सकता, जबकि इसके विपरीत कुछ अन्य बेंचों ने यह माना था कि लंबे समय तक जेल में बंद रखना और सुनवाई न होना मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

इसी वैचारिक मतभेद और कानूनी बहस के चलते अब इस अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील कानूनी मुद्दे को एक बड़ी बेंच (Larger Bench) के पास विचार के लिए भेज दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की सर्वोच्च अदालत नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों और न्याय मिलने में होने वाली अंतहीन देरी को लेकर बेहद गंभीर है। आने वाले समय में बड़ी बेंच का यह फैसला उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए एक बड़ी राहत का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, जो बिना किसी त्वरित फैसले के सालों-साल जेल की सलाखों के पीछे समय बिताने को मजबूर हैं।

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