व्यापार

RBI डिप्टी गवर्नर की बैंकों को दो टूक चेतावनी: कस्टमर डेटा के गलत इस्तेमाल से घट रहा भरोसा, डिजिटल सुरक्षा पर सख्त निर्देश

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर ने देश के बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र को लेकर एक बेहद गंभीर और विचारणीय बयान जारी करते हुए साफ शब्दों में चेतावनी दी है। मुंबई में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैंकिंग सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि बैंकिंग प्रणाली की सबसे बड़ी पूंजी तकनीक या मुनाफा नहीं, बल्कि ग्राहकों का अटूट भरोसा है, और वर्तमान दौर में यही भरोसा धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। तेजी से बढ़ते डिजिटल लेन-देन के इस युग में वित्तीय संस्थान जिस तरह ग्राहकों के संवेदनशील निजी और वित्तीय डेटा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उस पर केंद्रीय बैंक ने गहरी नाराजगी जताई है। डिप्टी गवर्नर ने दो टूक कहा कि अगर बैंकों ने डेटा सुरक्षा, पारदर्शिता और नैतिक व्यावसायिक आचरण को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी, तो आने वाले समय में वित्तीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

ग्राहकों का डेटा कोई कमोडिटी नहीं, नैतिक सीमाओं का हो पालन

डिप्टी गवर्नर ने अपने संबोधन में रेखांकित किया कि कई वाणिज्यिक बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) डिजिटल विस्तार की होड़ में बुनियादी बैंकिंग मर्यादाओं को भूल रही हैं। ग्राहकों की सहमति के बिना उनके डेटा को थर्ड-पार्टी फिनटेक कंपनियों, रिकवरी एजेंसियों या टेलीकॉलिंग प्लेटफॉर्म्स के साथ साझा किया जा रहा है, जिससे अनचाही कॉल्स और अनधिकृत लोन ऑफर्स की बाढ़ आ गई है। केंद्रीय बैंक के शीर्ष अधिकारी ने स्पष्ट किया कि ग्राहक का डेटा केवल बैंकिंग सेवाओं के सुचारू संचालन के लिए है, न कि आक्रामक क्रॉस-सेलिंग या मुनाफाखोरी का जरिया। बैंकों को यह समझना होगा कि डेटा की गोपनीयता का उल्लंघन केवल नियमों की अवहेलना नहीं है, बल्कि यह उस बुनियादी सामाजिक अनुबंध पर सीधा हमला है जो एक खाताधारक और बैंक के बीच सदियों से कायम रहा है।

बढ़ते डिजिटल फ्रॉड और साइबर जोखिमों पर केंद्रीय बैंक की नजर

कोरोना काल के बाद से देश में यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग और नेट बैंकिंग का विस्तार अभूतपूर्व गति से हुआ है, लेकिन इसके साथ ही साइबर अपराध, एपीआई लीकेज और फिशिंग घोटालों का जाल भी तेजी से फैला है। डिप्टी गवर्नर ने इस बात पर विशेष चिंता व्यक्त की कि धोखाधड़ी के मामलों में अक्सर यह देखने को मिलता है कि ग्राहकों की संवेदनशील जानकारी सिस्टम से ही लीक हो जाती है। जब किसी आम आदमी के साथ फ्रॉड होता है, तो बैंक अक्सर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए पूरा दोष ग्राहक की असावधानी पर मढ़ने की कोशिश करते हैं। आरबीआई ने चेताया है कि यह रवैया कतई स्वीकार्य नहीं होगा। यदि किसी बैंक का आंतरिक आईटी ढांचा या वेंडर मैनेजमेंट सिस्टम कमजोर पाया जाता है, तो बैंक प्रबंधन को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा और कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

एल्गोरिदम और एआई मॉडल के मनमाने इस्तेमाल पर सख्ती की तैयारी

आधुनिक बैंकिंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग का दखल तेजी से बढ़ा है, जिसका उपयोग ग्राहकों की क्रेडिट प्रोफाइलिंग, लोन अप्रूवल और रिस्क असेसमेंट के लिए हो रहा है। डिप्टी गवर्नर ने इशारा किया कि कई एल्गोरिदम पक्षपातपूर्ण तरीके से डिजाइन किए जा रहे हैं, जिससे समाज के कमजोर वर्गों या दूरदराज के क्षेत्रों के ग्राहकों को बिना किसी ठोस आधार के वित्तीय सेवाओं से वंचित कर दिया जाता है। इस तरह के अपारदर्शी 'ब्लैक बॉक्स' मॉडल्स पर रोक लगाने के लिए आरबीआई जल्द ही विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार कर रहा है। वित्तीय संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके एआई और ऑटोमेटेड टूल्स पूरी तरह निष्पक्ष, व्याख्या योग्य और नियामक दिशानिर्देशों के दायरे में हों, ताकि किसी भी उपभोक्ता के बुनियादी अधिकारों का हनन न हो।

शिकायत निवारण तंत्र की विफलता पर मैनेजमेंट को खरी-खरी

ग्राहक सेवा और आंतरिक लोकपाल व्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर भी डिप्टी गवर्नर ने कड़ा असंतोष जाहिर किया। उन्होंने कहा कि बैंकिंग ऑम्बड्समैन के पास पहुंचने वाली शिकायतों की भारी संख्या यह दर्शाती है कि बैंकों का आंतरिक शिकायत निवारण ढांचा या तो निष्क्रिय है या फिर ग्राहकों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रहा। जब किसी खाताधारक की समस्या का समाधान ब्रांच या बैंक के स्तर पर महीनों तक नहीं होता, तभी वह मजबूरन रेगुलेटर का दरवाजा खटखटाता है। डिप्टी गवर्नर ने बैंकों के निदेशक मंडलों (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) से सीधा सवाल किया कि वे कस्टमर सर्विस और डेटा गवर्नेंस को केवल औपचारिक एजेंडा आइटम क्यों मानते हैं। उन्होंने निर्देश दिया कि प्रत्येक बैंक के बोर्ड को डेटा सुरक्षा और ग्राहक संतुष्टि की नियमित स्वतंत्र समीक्षा करनी चाहिए।

लखनऊ से लेकर छोटे शहरों तक शाखाओं में मानवीय संपर्क बनाए रखने पर जोर

डिजिटल बैंकिंग के प्रसार के बावजूद देश की एक बड़ी आबादी आज भी फिजिकल ब्रांच और बैंक कर्मचारियों के मानवीय व्यवहार पर भरोसा करती है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, कानपुर या अन्य गैर-महानगरीय क्षेत्रों में बुजुर्ग, पेंशनभोगी और छोटे व्यापारी डिजिटल जटिलताओं से अक्सर असहज महसूस करते हैं। डिप्टी गवर्नर ने बैंकों को सलाह दी कि वे केवल डिजिटल इंटरफेस के भरोसे न बैठें, बल्कि शाखाओं में ग्राहकों के साथ सहानुभूतिपूर्ण संवाद को बढ़ावा दें। जब तक बैंक का ग्राउंड स्टाफ संवेदनशील नहीं होगा, तब तक किसी भी तकनीक से खोया हुआ भरोसा दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता। स्थानीय स्तर पर वित्तीय साक्षरता और डेटा जागरूकता अभियान चलाना अब बैंकों की वैकल्पिक गतिविधि नहीं बल्कि अनिवार्य कर्तव्य होना चाहिए।

दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के लिए विश्वास ही एकमात्र आधार

भाषण के समापन सत्र में डिप्टी गवर्नर ने इस बात पर बल दिया कि बैंकिंग उद्योग का टिकाऊ विकास केवल बैलेंस शीट के आकार या त्रैमासिक मुनाफे से तय नहीं हो सकता। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी वित्तीय संस्थान ने अपने ग्राहकों के विश्वास के साथ खिलवाड़ किया है, तब-तब उसका पतन तय हुआ है। बैंकों को अल्पकालिक लाभ की मानसिकता को छोड़कर दीर्घकालिक साख निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना होगा। केंद्रीय बैंक ने साफ संकेत दे दिया है कि वह आने वाले दिनों में डेटा ऑडिट, साइबर सिक्योरिटी रिव्यू और कस्टमर प्रोटेक्शन नॉर्म्स की निगरानी और अधिक सख्त करेगा, ताकि भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता पर कोई आंच न आने पाए।

Back to top button