विदेश

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में खुली पोल, तेहरान से टकराव बना इस्लामाबाद की बर्बादी का नुस्खा

पश्चिम एशिया में जारी भारी भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते टकराव के बीच वाशिंगटन की विदेश नीति को लेकर एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय खुलासा सामने आया है। वैश्विक रक्षा एवं सुरक्षा मामलों के प्रतिष्ठित मंच 'रियल क्लियर डिफेंस' (Real Clear Defense) की एक विस्तृत रणनीतिक रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई है कि ईरान पर अपने कड़े प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव को जमीनी स्तर पर लागू कराने के लिए पाकिस्तान को मोहरा बनाना अमेरिका की एक अत्यंत दोषपूर्ण और आत्मघाती रणनीति साबित होगी। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की अपनी आंतरिक सुरक्षा, चरमराती अर्थव्यवस्था और गंभीर ऊर्जा संकट तेहरान के साथ उसके स्थिर कामकाजी संबंधों पर पूरी तरह निर्भर हैं। यदि व्हाइट हाउस इस्लामाबाद पर तेहरान के खिलाफ कठोर कदम उठाने या आर्थिक नाकेबंदी में भागीदार बनने का दबाव डालता है, तो इससे ईरान को सीमित नुकसान भले पहुंचे, लेकिन खुद पाकिस्तान एक बहुत बड़े ऊर्जा संकट, सीमावर्ती गृहयुद्ध और आर्थिक तबाही के दलदल में धंस जाएगा।

बलूचिस्तान सीमा पर भड़क सकती है अशांति: तेहरान से तनाव बढ़ते ही बढ़ेंगे सुरक्षा खतरे

रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि पाकिस्तान के सबसे अशांत और संवेदनशील प्रांत बलूचिस्तान की 900 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा ईरान से लगती है। यदि इस्लामाबाद वाशिंगटन के दबाव में आकर ईरान विरोधी रुख अपनाता है, तो इसका पहला और सबसे घातक असर इसी सीमावर्ती इलाके पर पड़ेगा। बलूचिस्तान में पहले से ही अलगाववादी विद्रोही संगठन और चरमपंथी गुट सक्रिय हैं, जो दोनों देशों के सीमा पार सुरक्षा तंत्र के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। तेहरान के साथ किसी भी कूटनीतिक कड़वाहट की स्थिति में सीमा प्रबंधन पूरी तरह ध्वस्त हो सकता है और दोनों सेनाओं के बीच अविश्वास बढ़ने से सीमा पार से होने वाली झड़पें बढ़ सकती हैं। इसके अलावा पाकिस्तान की सऊदी अरब के साथ पुरानी रक्षा प्रतिबद्धताएं और वित्तीय निर्भरता भी उसकी स्थिति को और अधिक उलझा देती हैं। एक तरफ रियाद का पारंपरिक दबाव और दूसरी तरफ अमेरिका की पाबंदियां, इन दोनों के बीच पिस रहे पाकिस्तान के लिए ईरान जैसी पड़ोसी ताकत से सीधे बैर मोल लेना अपनी पश्चिमी सीमा पर नया युद्ध मोर्चा खोलने जैसा आत्मघाती कदम होगा।

ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन और चीन का दखल: ऊर्जा संकट से जूझते मुल्क की मजबूरी

पाकिस्तान वर्तमान में अपने इतिहास के सबसे गंभीर आर्थिक और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, जहां उद्योगों और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली व प्राकृतिक गैस की भारी किल्लत है। ऐसी नाजुक स्थिति में पाकिस्तान-ईरान गैस पाइपलाइन (IP Pipeline) परियोजना इस्लामाबाद के लिए जीवनदायिनी मानी जाती रही है। ईरान ने कई साल पहले अपने हिस्से का पाइपलाइन बुनियादी ढांचा पूरी तरह तैयार कर लिया था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों (CAATSA) के डर से पाकिस्तान अपनी सीमा के भीतर निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ा पाया। इसके चलते तेहरान पहले ही अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत (आर्बिट्रेशन) के जरिए पाकिस्तान पर अरबों डॉलर के भारी जुर्माने का कानूनी दबाव बना रहा है। इस समीकरण में बीजिंग की मौजूदगी ने मामले को और पेचीदा कर दिया है। चीन ईरान से भारी मात्रा में रियायती कच्चे तेल का आयात करता है और खाड़ी क्षेत्र से अपनी ऊर्जा आपूर्ति को हर हाल में सुरक्षित रखना चाहता है। साथ ही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) का केंद्र बिंदु बलूचिस्तान का ग्वादर बंदरगाह है। ऐसे में अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान द्वारा उठाए जाने वाले किसी भी ईरान विरोधी कदम से चीन के रणनीतिक हित सीधे प्रभावित होंगे, जिसे बीजिंग कभी स्वीकार नहीं करेगा।

बलूचिस्तान का सीमा पार अनौपचारिक ईंधन नेटवर्क: ईरानी तेल बंद हुआ तो तबाह होगी स्थानीय अर्थव्यवस्था

सामरिक रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों की जमीनी आर्थिक हकीकत है। बलूचिस्तान के विशाल रेगिस्तानी और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों की दैनिक आजीविका पूरी तरह ईरान से होने वाले अनौपचारिक (स्मगलिंग) पेट्रोल और डीजल के कारोबार पर टिकी हुई है। ईरानी ईंधन पाकिस्तानी सीमा में कम कीमत पर पहुंचता है, जिससे स्थानीय ट्रांसपोर्ट, छोटे कारखाने और व्यापारियों का चूल्हा जलता है। यदि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव में इस सीमा पार ईंधन कारोबार पर सख्त पहरा लगाता है, तो इससे ईरान के राजस्व पर आंशिक असर पड़ेगा, लेकिन बलूचिस्तान के हजारों परिवार रातों-रात बेरोजगार हो जाएंगे, जिससे स्थानीय आबादी में विद्रोह और असंतोष की ज्वाला और भड़क सकती है। इसके अतिरिक्त बलूचिस्तान के तटीय मकरान क्षेत्र, जिसमें सामरिक दृष्टि से अहम ग्वादर बंदरगाह भी शामिल है, की दैनिक बिजली आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा सीधे ईरान से आने वाले पावर ग्रिड ट्रांसमिशन पर निर्भर है। यदि तेहरान ने जवाबी कार्रवाई में बिजली का स्विच बंद किया या सीमा पार आवाजाही रोकी, तो पूरा मकरान तट अंधकार में डूब जाएगा और वहां का जनजीवन पूरी तरह ठप हो जाएगा।

दो पाटों के बीच फंसा इस्लामाबाद: वाशिंगटन की मांगें और पड़ोस की जमीनी सच्चाइयां

निष्कर्ष के तौर पर रिपोर्ट यह साफ करती है कि अमेरिका को दक्षिण और पश्चिम एशिया की जमीनी हकीकत को समझना होगा। अमेरिका द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने बेशक तेहरान की वित्तीय स्थिति पर दबाव बनाया है, लेकिन पाकिस्तान को एक प्रवर्तन एजेंट (Enforcer) के रूप में इस्तेमाल करने की सोच बुनियादी रूप से त्रुटिपूर्ण है। पाकिस्तान आज उस मोड़ पर खड़ा है जहां वह न तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और वाशिंगटन की नाराजगी मोल ले सकता है, और न ही अपने पड़ोसी मुल्क ईरान से रिश्ते बिगाड़कर अपने घर में अंधेरा और अशांति ला सकता है। यदि अमेरिका ने पाकिस्तान पर अपनी नीति थोपने की अनावश्यक जिद की, तो यह रणनीति उल्टी पड़ जाएगी और क्षेत्र में शांति स्थापित होने के बजाय पाकिस्तान का आंतरिक ढांचा चरमरा जाएगा, जिसका सीधा रणनीतिक लाभ इस क्षेत्र में अमेरिका विरोधी ताकतों को ही मिलेगा।

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