विदेश

आईडीएफ चीफ ने नेतन्याहू का ईरान पर हमले का आदेश मानने से साफ किया इनकार

पश्चिम एशिया के सबसे शक्तिशाली और सामरिक रूप से संवेदनशील देश इजरायल से इस वक्त एक बहुत बड़ी, चौंकाने वाली और भूचाल ला देने वाली खबर सामने आ रही है। इजरायली राजनीतिक गलियारों और सैन्य मुख्यालय के बीच इन दिनों एक ऐसा 'अभूतपूर्व टकराव' देखने को मिल रहा है, जिसने देश के आंतरिक और बाहरी सुरक्षा ढांचे को हिलाकर रख दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, इजरायली सेना यानी आईडीएफ (IDF) के प्रमुख ने देश के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा ईरान पर एक और बड़े सैन्य हमले के लिए दिए गए सीधे आदेश को मानने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है। दशकों के इजरायली इतिहास में यह पहला ऐसा मौका है जब देश की राजनीतिक कार्यपालिका और सैन्य नेतृत्व के बीच इतना गहरा मतभेद खुलकर सतह पर आया है। इस हाई-प्रोफाइल गतिरोध ने न केवल इजरायली रक्षा तंत्र की पोल खोल दी है, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध के मोर्चे पर एक नए और बड़े राजनीतिक संकट को भी जन्म दे दिया है।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और सैन्य कमान के बीच बढ़ता तनाव

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पिछले काफी समय से अपनी आक्रामक और आवरणहीन सैन्य रणनीतियों के लिए जाने जाते रहे हैं। गाजा और लेबनान के बाद अब उनका मुख्य फोकस क्षेत्रीय स्तर पर ईरान के खिलाफ एक निर्णायक और बड़े पैमाने पर सैन्य प्रहार करने का है। लेकिन इस बार बेंजामिन नेतन्याहू के इन आक्रामक इरादों को देश के शीर्ष सैन्य अधिकारियों और खुद सेना प्रमुख का कड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ रहा है। आईडीएफ चीफ और अन्य वरिष्ठ कमांडरों का स्पष्ट मानना है कि लगातार कई मोर्चों पर महीनों से चल रहे भीषण युद्ध के कारण इजरायली सेना के संसाधन, गोला-बारूद और सैनिकों की मानसिक व शारीरिक क्षमता अपनी सीमा तक पहुंच चुकी है। ऐसे समय में ईरान जैसे भारी-भरकम और रणनीतिक रूप से सुसज्जित देश के खिलाफ बिना सोचे-समझे कोई भी नया सैन्य अभियान छेड़ना देश की सुरक्षा के लिए एक बड़ा और आत्मघाती जुआ साबित हो सकता है।

आईडीएफ चीफ का कड़ा रुख और ईरान पर हमले को लेकर जमीनी यथार्थ

इजरायली सेना के शीर्ष नेतृत्व का यह मानना है कि देश को इस वक्त लगातार चल रहे युद्धों से उबारने और अपनी आंतरिक रक्षा प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता है, न कि क्षेत्रीय तनाव को और अधिक बढ़ावा देने की। ईरान के पास जिस प्रकार की उन्नत मिसाइलें, ड्रोन नेटवर्क और परमाणु कार्यक्रम की क्षमताएं हैं, उसके खिलाफ अकारण युद्ध मोल लेना इजरायल की अर्थव्यवस्था और जनजीवन के लिए भारी आपदा ला सकता है। सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री के आदेश को दरकिनार करते हुए यह तर्क दिया है कि सैन्य ताकत का इस्तेमाल केवल देश की तात्कालिक रक्षा के लिए होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक एजेंडे को साधने के लिए। सेना के इस साहसी और कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि अब इजरायली सैनिक और कमांडर केवल राजनीतिक दबाव के आगे झुककर देश को खतरे में डालने को तैयार नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्रीय हित और जमीनी हकीकत को सर्वोपरि मान रहे हैं।

क्षेत्रीय भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं पर इस टकराव का असर

इजरायल के भीतर चल रहे इस अभूतपूर्व राजनीतिक और सैन्य संघर्ष का असर केवल तेल अवीव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गूंज वाशिंगटन से लेकर तेहरान तक सुनाई दे रही है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश जो लगातार इजरायल की सैन्य रणनीतियों के साझीदार रहे हैं, वे भी इस बात से चिंतित हैं कि यदि इजरायल के भीतर ही सरकार और सेना आमने-सामने आ गईं, तो पश्चिम एशिया का संतुलन पूरी तरह से चरमरा जाएगा। ईरान और उसके समर्थक गुट भी इजरायल के इस आंतरिक मतभेद पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस टकराव से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई है, क्योंकि यदि देश की सेना ही उनके फैसलों पर सवाल उठाने लगे, तो उनका भविष्य अधर में लटक सकता है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि युद्ध की आग में झुलस रहे देश में भी लोकतंत्र और संस्थागत संतुलन की अपनी एक अलग ताकत होती है।

इजरायली लोकतंत्र और भविष्य के राजनीतिक समीकरणों पर मंडराते बादल

इस बड़े आंतरिक संकट के बाद अब इजरायल की राजनीति में एक नए भूचाल के आने की पूरी संभावना बन गई है। जनता और विपक्ष के बीच पहले से ही नेतन्याहू सरकार की नीतियों को लेकर भारी असंतोष व्याप्त था, और अब सेना के साथ सीधा टकराव सामने आने के बाद सरकार पर इस्तीफे का दबाव और अधिक बढ़ गया है। इजरायली नागरिक अब यह सवाल पूछने लगे हैं कि क्या व्यक्तिगत राजनीतिक हितों के लिए देश के सैनिकों और सुरक्षा को दांव पर लगाया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि बेंजामिन नेतन्याहू इस अभूतपूर्व सैन्य विद्रोह और राजनीतिक संकट से कैसे पार पाते हैं। एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि इस घटना ने इजरायल के रक्षा इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय जोड़ दिया है, जो आने वाले लंबे समय तक देश की राजनीति और सामरिक नीतियों को गहराई से प्रभावित करता रहेगा।

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