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दिल्ली पुलिस में बगावत जैसे हालात: ACP और SHO के तबादले पर भड़के जवान, पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन के बीच कमिश्नर को सौंपी 5 मांगें

देश की राजधानी में कानून-व्यवस्था संभालने वाली दिल्ली पुलिस के भीतर आंतरिक असंतोष और आक्रोश की अभूतपूर्व तस्वीर सामने आई है। जय सिंह रोड स्थित दिल्ली पुलिस के नए मुख्यालय के बाहर सैकड़ों पुलिसकर्मियों ने एकत्रित होकर वरिष्ठ अधिकारियों की मनमानी और प्रशासनिक निर्णयों के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। यह पूरा बवाल एक संवेदनशील मामले में निष्पक्ष कार्रवाई कर रहे लोकप्रिय एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) और संबंधित थाना प्रभारी यानी एसएचओ (थानाध्यक्ष) के अचानक किए गए तबादले के बाद भड़का। वर्दीधारी और सादे कपड़ों में पहुंचे निचले व मध्यम स्तर के जवानों ने विभागीय शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए मुख्यालय परिसर के मुख्य द्वार पर नारेबाजी की। पुलिस बल के भीतर इस तरह का खुला विरोध प्रदर्शन राजधानी के सुरक्षा तंत्र में बड़े प्रशासनिक गतिरोध की ओर इशारा कर रहा है।

राजनीतिक और रसूखदारों के दबाव में तबादले का गंभीर आरोप

प्रदर्शन में शामिल जवानों और अधिकारियों का सीधा आरोप है कि हाल ही में इलाके के एक प्रभावशाली और रसूखदार गुट के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की गई थी। इस निष्पक्ष कार्रवाई से नाराज होकर स्थानीय राजनीतिक दबाव बनाया गया, जिसके आगे पुलिस के शीर्ष आलाकमान ने घुटने टेक दिए और फील्ड में मुस्तैदी से काम कर रहे एसीपी तथा एसएचओ को रातों-रात लाइन हाजिर व गैर-संवेदनशील पदों पर स्थानांतरित कर दिया गया। जवानों का कहना है कि जब भी कोई निष्ठावान पुलिस अधिकारी कानून के मुताबिक अपराधियों या बाहुबलियों पर हाथ डालता है, तो उसका मनोबल बढ़ाने के बजाय शीर्ष स्तर से बलि का बकरा बना दिया जाता है। इस तरह के अनुचित प्रशासनिक दबाव से ग्राउंड लेवल पर गश्त और जांच करने वाले पुलिसकर्मियों का आत्मविश्वास पूरी तरह टूट रहा है।

पुलिस कमिश्नर को सौंपी गई 5 सूत्रीय प्रमुख मांगें

विरोध प्रदर्शन के बढ़ते दबाव और मुख्यालय के बाहर बिगड़ती स्थिति को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रदर्शनकारियों से वार्ता की। इस दौरान जवानों की ओर से दिल्ली पुलिस कमिश्नर को संबोधित एक औपचारिक 5 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा गया:

  1. तबादला आदेशों की तत्काल वापसी: एसीपी और संबंधित एसएचओ के तबादला व लाइन हाजिर करने के आदेश को बिना शर्त और तुरंत प्रभाव से रद्द कर उन्हें उनके पद पर बहाल किया जाए।

  2. बाहरी दबाव की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच: फील्ड पोस्टिंग और तबादलों में हो रहे राजनीतिक व प्रशासनिक हस्तक्षेप की निष्पक्ष न्यायिक या सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा जांच कराई जाए।

  3. स्थिर कार्यकाल की कानूनी गारंटी: उच्चतम न्यायालय के 'प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ' फैसले के तहत फील्ड अधिकारियों के लिए तय न्यूनतम दो वर्ष के कार्यकाल की सुरक्षा को सख्ती से लागू किया जाए।

  4. प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक: अपने लोकतांत्रिक और गरिमापूर्ण अधिकारों के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले किसी भी सिपाही, दरोगा या अधिकारी के खिलाफ कोई विभागीय अनुशासनात्मक या निलंबन की कार्रवाई न की जाए।

  5. पारदर्शी पुलिस वेलफेयर व ग्रीवांस फोरम की स्थापना: निचले स्तर के जवानों की वास्तविक समस्याओं और सुरक्षा चिंताओं को सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाने के लिए एक स्वतंत्र और पारदर्शी शिकायत निवारण मंच को दोबारा सक्रिय किया जाए।

मुख्यालय में आपातकालीन बैठक और शीर्ष नेतृत्व की सफाई

मुख्यालय के बाहर जवानों के भारी जमावड़े और मीडिया के पहुंचने के बाद पुलिस कमिश्नर ने स्पेशल कमिश्नर (लॉ एंड ऑर्डर) और विजिलेंस विंग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बंद कमरे में एक आपातकालीन समीक्षा बैठक बुलाई। आलाकमान की तरफ से प्रारंभिक तौर पर यह सफाई देने की कोशिश की गई कि संबंधित तबादले पूरी तरह से नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया और आंतरिक समीक्षा का हिस्सा हैं, जिनका किसी विशिष्ट जांच या दबाव से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, प्रदर्शनकारी जवान इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट आदेश जारी होने तक पीछे हटने को तैयार नहीं दिखे।

खाकी के भीतर उठता असंतोष और सुरक्षा तंत्र पर उठते सवाल

राजधानी में यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली पुलिस के जवानों को अपने ही मुख्यालय के बाहर न्याय और आत्मसम्मान के लिए खड़ा होना पड़ा हो। इससे पहले तीस हजारी कोर्ट विवाद के दौरान भी दिल्ली पुलिस के हजारों जवानों ने सड़कों पर उतरकर व्यवस्था के खिलाफ बिगुल फूंका था। जानकारों का मानना है कि यदि कानून के रखवालों को ही अपने कर्तव्य निर्वहन के बदले राजनीतिक दंड और मनमाने तबादलों का शिकार होना पड़ेगा, तो इससे न केवल पुलिस बल की कार्यकुशलता और निष्पक्षता प्रभावित होगी बल्कि राजधानी में आम नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था भी सीधे तौर पर खतरे में पड़ जाएगी। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पुलिस कमिश्नर इस बगावती तेवर को शांत करने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।

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