केरल के गुरुवायूर मंदिर में हैं सबसे ज्यादा हाथी

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर अत्यंत समृद्ध है, जहां परंपराओं के निर्वहन के लिए कई अनूठे तौर-तरीके सदियों से चले आ रहे हैं। दक्षिण भारत के राज्यों, विशेषकर केरल में मंदिरों की संस्कृति में हाथियों का एक विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जब भी देश के किसी मंदिर में सबसे अधिक हाथियों के होने की बात आती है, तो केरल के त्रिशूर जिले में स्थित विश्वप्रसिद्ध श्री कृष्ण मंदिर यानी गुरुवायूर मंदिर का नाम सबसे पहले लिया जाता है। भगवान गुरुवायूरप्पम को समर्पित इस पवित्र धाम में हाथियों की संख्या देश के किसी भी अन्य धार्मिक स्थल की तुलना में सबसे अधिक है। यहां आने वाले भक्त केवल सोने-चांदी या धन-दौलत का ही दान नहीं करते, बल्कि अपनी मन्नतें पूरी होने या भगवान के प्रति अगाध आस्था के कारण विशालकाय हाथियों को भी दान स्वरूप मंदिर को समर्पित करते आए हैं। यही कारण है कि गुरुवायूर मंदिर के पास हाथियों का अपना एक बहुत बड़ा और भव्य गजराज परिवार है, जो देश-दुनिया के पर्यटकों और श्रद्धालुओं के बीच मुख्य आकर्षण का केंद्र रहता है।
पुन्नाथूर कोट्टा: जानिए कहां और कैसे रखे जाते हैं गुरुवायूर मंदिर के ये गजराज
गुरुवायूर मंदिर के पास हाथियों की संख्या इतनी अधिक है कि उन्हें मंदिर परिसर के अंदर रखना संभव नहीं है। इसके लिए मंदिर प्रबंधन यानी 'गुरुवायूर देवस्वोम बोर्ड' द्वारा मुख्य मंदिर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर एक विशेष और विशाल गजराज शरणार्थी शिविर का संचालन किया जाता है, जिसे पुन्नाथूर कोट्टा (Punnathur Kotta) या आनक्कोट्टा के नाम से जाना जाता है। कभी यह किला एक स्थानीय शासक का आवास हुआ करता था, जिसे बाद में मंदिर के हाथियों के आवास के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। एक समय में इस अनूठे हाथी अभ्यारण्य में साठ से अधिक हाथियों की देखरेख की जाती है। इन विशालकाय जीवों की सेवा और देखभाल के लिए दोस्तों से लेकर महावतों, डॉक्टरों और विशेष रसोइयों की एक बड़ी फौज तैनात रहती है। हाथियों को रोज नहलाने, उनके खान-पान, स्वास्थ्य परीक्षण और उनकी मालिश का एक निश्चित और अनुशासित दैनिक शेड्यूल होता है। मंदिर के उत्सवों, मेलों और मुख्य आयोजनों के दौरान जब ये सजे-धजे हाथी कतारबद्ध होकर चलते हैं, तो वह दृश्य देखने लायक होता है और हर किसी का मन मोह लेता है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है गजा राज 'गुरुवायूर केशवम' की पौराणिक गाथा
गुरुवायूर मंदिर और हाथियों के इस अटूट रिश्ते की जब भी चर्चा होती है, तब 'गराजावु' यानी गजराज गुरुवायूर केशवम का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। केशवम को गुरुवायूर मंदिर के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध, और सबसे अधिक पूजनीय हाथी माना जाता है। किंवदंतियों और इतिहास के अनुसार, इस विशालकाय और बेहद समझदार हाथी को सन 1922 में निलंबूर के राज परिवार द्वारा भगवान गुरुवायूरप्पम को दान दिया गया था। अपनी अद्भुत बुद्धिमत्ता, अनुशासित स्वभाव और भगवान के प्रति गहरी भक्ति के कारण केशवम कुछ ही वर्षों में देश भर के श्रद्धालुओं के बीच आस्था का प्रतीक बन गया था। मंदिर के मुख्य उत्सवों में भगवान की स्वर्ण प्रतिमा को अपनी सूंड पर उठाकर चलने का गौरव सिर्फ केशवम को ही प्राप्त था। आज भी हर साल गुरुवायूर एकादशी के पावन अवसर पर मंदिर के अन्य सभी हाथी कतरबद्ध होकर गुरुवायूर केशवम की आदमकद प्रतिमा के सामने श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि इन मंदिरों में हाथी केवल एक मूक पशु नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य और भगवान के सच्चे सेवक माने जाते हैं।
देश के अन्य बड़े मंदिरों में क्या है हाथियों की स्थिति और परंपरा?
दक्षिण भारत के अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों जैसे केरल के ही वडक्कुनाथन मंदिर, श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर और तमिलनाडु के कुछ प्राचीन मंदिरों में भी अनुष्ठानों के लिए हाथियों को रखने की पुरानी परंपरा रही है। हालांकि, वन्यजीव संरक्षण कानूनों, एनिमल वेलफेयर बोर्ड के कड़े नियमों और हाथियों के रखरखाव पर आने वाले भारी-भरकम खर्च के कारण पिछले कुछ दशकों में मंदिरों में रखे जाने वाले हाथियों की संख्या में देश भर में उल्लेखनीय कमी आई है। आज अधिकांश मंदिर औपचारिक या पारंपरिक उत्सवों के लिए अब रोबोटिक या यांत्रिक हाथियों का उपयोग करने लगे हैं ताकि जीवित वन्यजीवों को किसी प्रकार की मानसिक या शारीरिक पीड़ा न उठानी पड़े। इसके बावजूद, गुरुवायूर मंदिर का यह ऐतिहासिक हाथी शिविर आज भी अपनी इस प्राचीन परंपरा को जीवित रखे हुए है, जहां भक्तों द्वारा दान किए गए हाथियों की पूरी गरिमा और देखरेख के साथ सेवा की जाती है। यह स्थान वन्यजीव प्रेमियों और धार्मिक पर्यटकों के लिए भारतीय संस्कृति की अनूठी मिसाल पेश करता है, जहां आस्था और जीव-दया का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है।