धर्म

क्या आजादी से पहले नहीं जलता था लंकापति का पुतला? जानें सच

विजयादशमी यानी दशहरे के पावन अवसर पर देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशालकाय पुतलों का दहन किया जाता है। अक्सर सोशल मीडिया और आम चर्चाओं में यह सवाल तैरता है कि क्या आजादी से पहले भारत में रावण दहन की परंपरा नहीं थी? कई लोगों का मानना है कि शरणार्थियों द्वारा 1948 में रांची या 1953 में दिल्ली के रामलीला मैदान से विशाल पुतले जलाने का ट्रेंड शुरू हुआ। हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेज और शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि स्वतंत्रता से काफी पहले से भारत में रावण दहन का प्रचलन अलग-अलग रूपों में मौजूद था।

200 साल से भी पुरानी है रावण दहन की ऐतिहासिक परंपरा

इतिहासकारों और प्रामाणिक अभिलेखों के अनुसार, भारत में रावण के प्रतीकात्मक पुतले जलाने की शुरुआत करीब 200 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। 16वीं और 17वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की बढ़ती लोकप्रियता के साथ उत्तर भारत में रामलीला मंचन की भव्य परंपरा स्थापित हुई। 17वीं सदी में वाराणसी में तुलसीदास के शिष्य मेघा भगत द्वारा आयोजित रामलीलाओं में विजयदशमी के दिन रावण वध को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने के लिए छोटे पुतले या आकृतियां बनाकर उन्हें अग्नि के हवाले किया जाता था।

ब्रिटिश काल के ऐतिहासिक दस्तावेज और जेम्स प्रिंसेप की पेंटिंग

अंग्रेजी हुकूमत के समय भी रावण दहन का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के मशहूर विद्वान और चित्रकार जेम्स प्रिंसेप ने वर्ष 1834 में बनारस में आयोजित होने वाले भव्य दशहरे उत्सव का एक विस्तृत स्केच बनाया था। इस ऐतिहासिक स्केच में विशालकाय रावण का पुतला और उसके चारों तरफ एकत्र अपार जनसैलाब साफ दिखाई देता है। यह दुर्लभ चित्र आज भी लंदन स्थित प्रतिष्ठित ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित रखा हुआ है, जो इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि औपनिवेशिक दौर (1834) में भी रावण दहन की प्रथा पूरी शानो-शौकत से निभाई जाती थी।

रजवाड़ों और स्थानीय रियासतों में दशहरे की अनूठी झलक

आजादी से पहले भारत के विभिन्न रजवाड़ों और देसी रियासतों में भी दशहरा बहुत धूमधाम से मनाया जाता था। मैसूर, कोटा, जयपुर, ग्वालियर और रीवा जैसी रियासतों में राजा-महाराजा स्वयं रामलीला आयोजनों के संरक्षक होते थे। कोटा रियासत में 1893 में तत्कालीन महाराज उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल में भव्य सार्वजनिक मेला और रावण दहन की औपचारिक शुरुआत हुई थी। उस समय बांस, घास-फूस, कपड़े और आतिशबाजी से लैस पुतले बनाए जाते थे, जिन्हें राजा द्वारा तीर चलाकर दहन किया जाता था।

आजादी के बाद कैसे बदला रावण दहन का स्वरूप?

स्वतंत्रता प्राप्ति और 1947 के विभाजन के बाद रावण दहन के आयोजन में व्यापक सामाजिक बदलाव आया। पाकिस्तान के पंजाब व सिंध प्रांत से भारत आए शरणार्थी परिवारों ने रांची, दिल्ली, नागपुर और लुधियाना जैसे शहरों में अपनी सांस्कृतिक एकजुटता दर्शाने के लिए विशालकाय 50 से 100 फीट ऊंचे पुतले जलाने की सार्वजनिक प्रथा शुरू की। इसने दशहरे को एक सीमित धार्मिक अनुष्ठान से बढ़ाकर विशाल सार्वजनिक महा-उत्सव में बदल दिया, जिसे आज हम आधुनिक भारत में देखते हैं।

धार्मिक मान्यता और अधर्म पर धर्म की अमर विजय

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अधर्मी लंकापति रावण का संहार किया था। इसी पावन स्मृति में विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मनाया जाता है। रावण दहन केवल एक बाहरी पुतला जलाना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी पांच विकारों को समाप्त करने का एक महान आध्यात्मिक संदेश प्रदान करता है।

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