मिडटर्म चुनाव के बाद बढ़ेगा जंग का खतरा, हार से बौखलाए ट्रंप दे सकते हैं भीषण

दुनिया भर के कूटनीतिक और रणनीतिक हलकों में पश्चिम एशिया और अमेरिका के रिश्तों को लेकर एक बेहद सनसनीखेज दावा सामने आया है। अमेरिका में होने जा रहे आगामी मिडटर्म चुनावों को लेकर राजनीति पूरी तरह से गरमा चुकी है और इस बीच अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन चुनावों में अपनी राजनीतिक जमीन खोते हैं या उन्हें झटका लगता है, तो वह ध्यान भटकाने के लिए ईरान पर भीषण सैन्य कार्रवाई को हरी झंडी दे सकते हैं। पहले यह माना जा रहा था कि चुनावों तक अमेरिका सीधे संघर्ष से परहेज करेगा, लेकिन अब वाशिंगटन के अंदरूनी सूत्रों और वैश्विक थिंक-टैंकों से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव खत्म होते ही स्थिति भयानक रूप ले सकती है। यह दावा केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि इसके पीछे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी नौसेना की बदलती तैनाती और क्षेत्रीय सहयोगियों को दिए गए अलर्ट शामिल हैं। यदि यह आशंका सच साबित होती है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर पूरे खाड़ी क्षेत्र में बारूद की गंध और तेज हो जाएगी, जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति को तबाह कर सकती है।
अमरीकी राजनीति का घरेलू दबाव और विदेशी धरती पर युद्ध की आशंका
अमेरिकी इतिहास में यह कई बार देखा गया है कि जब भी किसी राष्ट्रपति को घरेलू मोर्चे पर भारी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तब ध्यान भटकाने के लिए विदेश नीति और सैन्य अभियानों का सहारा लिया जाता है। वर्तमान समय में डोनाल्ड ट्रंप पर रिपब्लिकन पार्टी को संसद के दोनों सदनों (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट) में बहुमत दिलाने का भारी दबाव है। अगर मिडटर्म चुनाव के नतीजे ट्रंप के पक्ष में नहीं आते हैं और डेमोक्रेटिक पार्टी अपनी बढ़त बना लेती है, तो ट्रंप के लिए अपने बाकी कार्यकाल को बिना किसी रुकावट के चलाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में राजनीतिक पंडितों का दावा है कि राजनीतिक नुकसान की भरपाई करने और अपनी सख्त छवि को दोबारा पेश करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के परमाणु और मिसाइल ठिकानों पर बड़े हमलों की अनुमति दे सकते हैं। घरेलू दबाव का यह अंतरराष्ट्रीय असर पूरे मध्य पूर्व को युद्ध की भट्टी में झोंकने की क्षमता रखता है।
ईरान पर हमले को लेकर क्या है ट्रंप की रणनीति और कूटनीतिक चाल
मिडटर्म चुनावों से ठीक पहले ट्रंप ने सार्वजनिक बयानों में यह कहकर वैश्विक तनाव को थोड़ा ढीला करने की कोशिश की थी कि चुनावों से पहले कोई भी नया हमला नहीं होगा। हालांकि, उनके इस बयान को रणनीतिक विशेषज्ञों द्वारा केवल एक चुनावी चाल और समय खींचने का पैंतरा माना जा रहा है। ईरान के साथ चल रही अप्रत्यक्ष बातचीत और परमाणु समझौते की शर्तों पर खींचतान के बीच पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) ने अपनी तैयारी पूरी कर रखी है। सूत्रों का कहना है कि मिडटर्म चुनाव के ठीक बाद ट्रंप के पास खोने के लिए कुछ नहीं होगा और वह अपनी शर्ते मनवाने के लिए तेहरान पर सबसे विनाशकारी हमला करने का फैसला ले सकते हैं। यह पूरी रणनीति इस बात पर टिकी है कि ईरान को इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह किसी भी हाल में अमेरिकी शर्तों के सामने झुकने पर मजबूर हो जाए।
मध्य पूर्व में सहयोगी देशों को मिला अलर्ट और तेल बाजार पर मंडराता संकट
अमेरिका के इस संभावित आक्रामक रुख को देखते हुए केवल ईरान ही नहीं, बल्कि उसके पड़ोसी देश भी भारी घबराहट के माहौल में हैं। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका ने अपने प्रमुख क्षेत्रीय सहयोगियों जैसे इज़राइल, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों को चुनाव बाद की किसी भी संभावित प्रतिक्रिया और ईरान के पलटवार से निपटने के लिए तैयार रहने की गुप्त सूचनाएं दी हैं। ईरान भी हाथ पर हाथ रखकर बैठने वालों में से नहीं है; तेहरान ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि अगर उस पर कोई भी हमला होता है, तो वह होर्मुज की खाड़ी में जहाजों की आवाजाही पूरी तरह ठप कर देगा और पूरे क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपना निशाना बनाएगा। इस तरह की स्थिति बनने से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे अमेरिका समेत पूरी दुनिया में महंगाई का नया रिकॉर्ड बन सकता है।
क्या टल सकता है यह भीषण युद्ध या फिर होकर रहेगी तबाही
अंतरराष्ट्रीय शांति समर्थकों और संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं की निगाहें फिलहाल अमेरिका के चुनावी नतीजों और उसके तुरंत बाद उठने वाले कदमों पर टिकी हैं। तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देश तेहरान और वाशिंगटन के बीच मध्यस्थता कराने की आखिरी कोशिशों में जुटे हैं ताकि किसी भी तरह इस संभावित युद्ध को रोका जा सके। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप का मिजाज और उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति अक्सर अप्रत्याशित फैसले लेने के लिए जानी जाती है। यदि चुनाव नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे, तो ट्रंप अपनी ताकत का प्रदर्शन करने में जरा भी संकोच नहीं करेंगे। आने वाले दिन न केवल अमेरिकी लोकतंत्र की दिशा तय करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि मध्य पूर्व शांति की दिशा में आगे बढ़ेगा या फिर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे भयानक सैन्य संकट की ओर धकेला जाएगा।