लोकसभा और विधानसभा में SC-ST आरक्षित सीटों का रोटेशन नहीं होगा

देश के संसदीय और राजनीतिक इतिहास में चुनाव प्रक्रियाओं से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर देश की शीर्ष अदालत का बड़ा फैसला सामने आया है। उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों का हर चुनाव में रोटेशन (चक्रीय बदलाव) अनिवार्य करने की मांग वाली याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट रूप से रुख अपनाते हुए कहा कि आरक्षित सीटों में रोटेशन लागू करना या परिसीमन कानून में बदलाव करना पूरी तरह से विधायिका (संसद) का अधिकार क्षेत्र (Legislative Domain) है, न कि न्यायपालिका का। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट संसद का 'तीसरा सदन' नहीं बन सकता और याचिकाकर्ता को इस नीतिगत बदलाव के लिए जनप्रतिनिधियों और संसद का रुख करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश: सीटों का रोटेशन संसद का अधिकार क्षेत्र, अदालत का नहीं
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और पीठ के समक्ष जब इस याचिका पर बहस शुरू हुई, तो अदालत ने संवैधानिक शक्ति संतुलन (Separation of Powers) का हवाला देते हुए हस्तक्षेप से साफ इनकार कर दिया। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि भारत के संविधान के तहत चुनाव क्षेत्रों के आरक्षण का स्वरूप, परिसीमन (Delimitation) और सीटों का रोटेशन एक नीतिगत विषय है जो डीलिमिटेशन एक्ट के धारा 9(1)(c) और संसद के अधीन आता है। अदालत कानून को रद्द कर सकती है या उसकी व्याख्या कर सकती है, लेकिन अपनी ओर से नई नीतियां नहीं बना सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता को लगता है कि दशकों तक एक ही सीट आरक्षित रहने से अन्य वर्गों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, तो इसके लिए संसद में जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर कानून में संशोधन कराना चाहिए।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें: दशकों से एक ही सीट आरक्षित रहने से सीमित हो रहा विकल्प
याचिका में मुख्य रूप से यह मुद्दा उठाया गया था कि वर्ष 1972 और उसके बाद से देश के कई विधानसभा और संसदीय क्षेत्रों को लगातार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रखा गया है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि रोटेशन व्यवस्था न होने के कारण एक ही निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य वर्ग या अन्य समुदायों के मतदाताओं का चुनाव लड़ने का अधिकार सालों तक बाधित रहता है। साथ ही यह भी दावा किया गया था कि बिना रोटेशन के एक ही सीट पर तीन या चार राजनीतिक परिवारों का एकाधिकार स्थापित हो जाता है, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और मतदाताओं के सामने विकल्पों की कमी हो जाती है। उन्होंने 2008 के परिसीमन आयोग की सिफारिशों का हवाला देकर कहा कि पंचायत और नगर निकायों की तर्ज पर विधानसभा और लोकसभा में भी रोटेशन नीति लागू होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: 'अदालत संसद का तीसरा सदन नहीं बन सकती'
अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों का जवाब देते हुए अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "हम संसद का तीसरा सदन नहीं बन सकते। संविधान के तहत कानून बनाने का काम जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का है।" पीठ ने समझाया कि स्थानीय निकाय (पंचायत और नगरपालिका) चुनावों में रोटेशन प्रणाली के नियम अलग राज्य स्तरीय कानूनों से संचालित होते हैं, जबकि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव परिसीमन अधिनियम और संवैधानिक प्रावधानों से नियंत्रित होते हैं। लिहाजा दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही किसी आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों का दायरा सीमित हो, लेकिन वहां के प्रत्येक नागरिक का 'वोट देने का मौलिक अधिकार' पूरी तरह सुरक्षित रहता है।
भारतीय राजनीति और भविष्य के चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर
शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया है कि जब तक केंद्र सरकार और संसद परिसीमन कानून या संविधान में संशोधन नहीं लातीं, तब तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एससी-एसटी आरक्षित सीटों का मौजूदा ढांचा यथावत बना रहेगा। इस निर्णय से उन कयासों और आशंकाओं पर पूर्णविराम लग गया है जो चुनावी राज्यों में सीटों के समीकरण बदलने को लेकर लगाई जा रही थीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से चुनावी प्रक्रियाओं में स्थिरता बनी रहेगी, हालांकि अब संसद के भीतर आरक्षित सीटों के समय-समय पर चक्रीय बदलाव (Rotation) को लेकर बहस और तेज हो सकती है।