Papankusha Ekadashi 2026: नवरात्रि और दशहरा के बाद कब है पापांकुशा एकादशी? जानें 21 या 22 अक्टूबर की सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पारण का समय

शारदीय नवरात्रि और विजयादशमी के पावन उत्सव के ठीक बाद सनातन धर्म में सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले एकादशी व्रतों की श्रृंखला में 'पापांकुशा एकादशी' का आगमन होता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली इस एकादशी को समस्त पापों पर अंकुश लगाने वाली और मोक्ष प्रदायिनी तिथि माना गया है। इस साल पंचांग में तिथियों के घट-बढ़ और दशमी युक्ता एकादशी के चलते श्रद्धालुओं और व्रत रखने वालों के बीच यह संशय बना हुआ है कि ग्यारस का व्रत 21 अक्टूबर को रखा जाए या 22 अक्टूबर को। धार्मिक ग्रंथों, पद्म पुराण और निर्णय सिंधु के स्पष्ट नियमों के अनुसार उदयातिथि और द्वादशी युक्त एकादशी के सिद्धांत के आधार पर सही तारीख का चयन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि व्रत का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त हो सके।
सनातन धर्म की वैष्णव और स्मार्त परंपरा में एकादशी के नियमों का अत्यंत सूक्ष्मता से पालन किया जाता है। जब भी एकादशी तिथि का स्पर्श दशमी तिथि से सूर्योदय के समय होता है, तो शास्त्रों में उसे 'विद्धा एकादशी' माना जाता है, जिसे गृहस्थों के लिए त्यागने की सलाह दी जाती है। वहीं, जब एकादशी का प्रभाव अगले दिन सूर्योदय काल में बना रहता है और द्वादशी तिथि का संयोग बनता है, तो उसे 'शुद्धा एकादशी' या अति पुण्यदायी एकादशी माना जाता है। पंचांगीय गणना के अनुसार आश्विन शुक्ल एकादशी तिथि का आरंभ 21 अक्टूबर की दोपहर से होकर 22 अक्टूबर की सुबह तक प्रभावी रहेगा, जिसके चलते उदयातिथि का मान 22 अक्टूबर 2026 को ही मान्य होगा।
21 या 22 अक्टूबर: जानें पापांकुशा एकादशी व्रत की सही तारीख
पंचांग के सूक्ष्म विश्लेषण के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 की दोपहर लगभग 01 बजकर 15 मिनट पर हो रही है। यह तिथि अगले दिन यानी गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को सुबह लगभग 11 बजकर 40 मिनट तक व्याप्त रहेगी।
शास्त्रों में सर्वमान्य नियम है कि सूर्योदय कालीन तिथि यानी उदयातिथि को ही व्रत और उपवास के लिए स्वीकार किया जाता है। 21 अक्टूबर के सूर्योदय के समय दशमी तिथि विद्यमान रहेगी, जबकि 22 अक्टूबर के सूर्योदय के समय पवित्र एकादशी तिथि उपस्थित रहेगी। अतः गृहस्थ और वैष्णव परंपरा के अनुसार पापांकुशा एकादशी का निर्जला या फलाहारी व्रत गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को ही रखा जाएगा। गुरुवार का दिन होने के कारण भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा का संयोग इस बार एकादशी के महत्व को कई गुना और अधिक बढ़ा रहा है।
पापांकुशा एकादशी 2026: शुभ पूजा मुहूर्त और पारण का समय
एकादशी व्रत का संकल्प और पूजा प्रातः काल सूर्योदय के बाद शुभ चौघड़िया या अमृत मुहूर्त में करना सबसे उत्तम माना जाता है। 22 अक्टूबर की सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप का ध्यान करते हुए पीले वस्त्र, पीले पुष्प, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित कर पूजन संपन्न करें।
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एकादशी तिथि प्रारंभ: 21 अक्टूबर 2026, दोपहर 01:15 बजे से
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एकादशी तिथि समाप्त: 22 अक्टूबर 2026, सुबह 11:40 बजे तक
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व्रत पारण की तिथि: शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
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पारण का शुभ समय: 23 अक्टूबर की सुबह 06 बजकर 28 मिनट से सुबह 08 बजकर 45 मिनट के मध्य
धार्मिक मान्यता है कि एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व और हरिवासर काल बीतने के बाद ही किया जाना चाहिए। द्वादशी के भीतर पारण न करने पर व्रत का फल निष्फल हो जाता है, इसलिए शुक्रवार की सुबह तय समय सीमा के भीतर ही ब्राह्मण को अन्न-जल या दान देकर व्रत खोलें।
पद्म पुराण में वर्णित पापांकुशा एकादशी का धार्मिक महात्म्य
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को पापांकुशा एकादशी के माहात्म्य के बारे में विस्तार से बताया है। 'पापांकुशा' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—पाप और अंकुश। जिस प्रकार एक महावत अंकुश के सहारे मतवाले हाथी को वश में कर लेता है, ठीक उसी प्रकार यह एकादशी मनुष्य द्वारा जाने-अनजाने में मन, वाणी और कर्म से किए गए घोर पापों पर अंकुश लगाकर उनका शमन कर देती है।
शास्त्रों का कथन है कि जो मनुष्य इस दिन सच्चे मन से उपवास रखकर भगवान विष्णु के 'पद्मनाभ' स्वरूप की आराधना करता है, उसे सहस्र अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञों के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यह व्रत न केवल व्रतकर्ता को सांसारिक सुख, ऐश्वर्य और निरोगी काया प्रदान करता है, बल्कि उसके मातृपक्ष, पितृपक्ष और ससुराल पक्ष की कई पीढ़ियों के पितरों को भी यमलोक के कष्टों से मुक्ति दिलाकर वैकुंठ धाम का मार्ग प्रशस्त करता है।
पापांकुशा एकादशी की पूजा विधि और व्रत के अनिवार्य नियम
पापांकुशा एकादशी का व्रत करने वाले साधकों को दशमी तिथि की संध्या से ही नियमों का पालन शुरू कर देना चाहिए:
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दशमी के नियम: दशमी तिथि (21 अक्टूबर) को सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन ग्रहण करें। इस दिन तामसिक भोजन, लहसुन, प्याज और चावल का त्याग पूरी तरह अनिवार्य माना गया है।
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संकल्प और पूजन: एकादशी (22 अक्टूबर) की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान विष्णु के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।
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भगवान पद्मनाभ का अभिषेक: पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पंचामृत, गंगाजल और केसर से अभिषेक करें। प्रभु को पीले चंदन का तिलक लगाएं और पीले फल व मिष्ठान का भोग लगाएं। ध्यान रहे कि भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल हो, क्योंकि बिना तुलसी के श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते।
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मंत्र जाप व कथा श्रवण: पूरे दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का मानसिक जाप करते रहें और दोपहर अथवा संध्या काल में पापांकुशा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा का श्रवण व पठन करें।
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रात्रि जागरण: इस एकादशी में रात्रि जागरण का विशेष विधान है। रात के समय भजन-कीर्तन करते हुए समय व्यतीत करना भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
एकादशी पर इन गलतियों से बिल्कुल बचें
एकादशी तिथि के दिन कुछ कार्यों को शास्त्रों में पूरी तरह वर्जित माना गया है। सबसे प्रमुख नियम यह है कि इस दिन घर के किसी भी सदस्य को चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के रक्त और मांस के भक्षण के समान माना गया है। इसके अलावा किसी पर क्रोध करना, परनिंदा, झूठ बोलना, पेड़-पौधों की पत्तियां तोड़ना और बाल व नाखून काटना भी इस पावन तिथि पर सर्वथा निषिद्ध है। 22 अक्टूबर को श्रद्धापूर्वक इस व्रत का अनुष्ठान कर साधक अपने जीवन के सभी कष्टों और पापों से मुक्ति पाकर आत्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं।