धर्म

Kartik Maas 2026: 27 अक्टूबर से शुरू हो रहा है भगवान विष्णु का सबसे प्रिय कार्तिक मास, जानें पूर्णिमा तक की सही तारीख और पूजा के 5 अनिवार्य नियम

सनातन धर्म में चातुर्मास के अंतर्गत आने वाले चार पवित्र महीनों में सबसे अंतिम और सबसे उत्तम महीना 'कार्तिक मास' माना गया है। शास्त्रों में इस माह को मोक्ष का द्वार और भगवान श्री हरि विष्णु तथा माता लक्ष्मी का सबसे प्रिय महीना कहा गया है। शरद पूर्णिमा के साथ ही आश्विन मास की समाप्ति होती है और अगले दिन से कार्तिक मास के स्नान, दान, तप और संयम के पावन अनुष्ठान का आरंभ हो जाता है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार सतयुग जैसा कोई युग नहीं, वेदों जैसा कोई शास्त्र नहीं और गंगा जैसी कोई नदी नहीं, ठीक उसी प्रकार कार्तिक के समान कोई दूसरा कल्याणकारी महीना नहीं है। इस माह में किए गए जप, तप, दीपदान और पवित्र नदियों में स्नान का फल अन्य महीनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है।

धार्मिक और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, साल 2026 में आश्विन मास की शरद पूर्णिमा का पर्व 26 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इसके पश्चात प्रतिपदा तिथि से कार्तिक मास की शुरुआत होगी। इसी महीने में सनातन संस्कृति के सबसे बड़े त्योहार जैसे करवा चौथ, रमा एकादशी, धनतेरस, रूप चौदस (नरक चतुर्दशी), दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पूजा, देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह और वैकुंठ चतुर्दशी मनाए जाते हैं। पूरे एक माह तक चलने वाले इस आत्मिक जागरण काल में देश के सभी तीर्थों, विशेषकर अयोध्या, मथुरा-वृंदावन, काशी, हरिद्वार और प्रयागराज के घाटों पर श्रद्धालु कल्पवास और प्रातःकालीन कार्तिक स्नान का संकल्प लेकर पहुंचते हैं।

कार्तिक मास 2026 कब से कब तक रहेगा? जानिए सही तारीख

पंचांगीय गणना के अनुसार वर्ष 2026 में कार्तिक मास का प्रारंभ मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 से हो रहा है। यह पवित्र माह पूरे 30 दिनों तक चलेगा और इसका समापन बुधवार, 25 नवंबर 2026 को कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) के पावन स्नान के साथ संपन्न होगा:

  • कार्तिक मास प्रारंभ (कृष्ण पक्ष प्रतिपदा): 27 अक्टूबर 2026 (मंगलवार)

  • कार्तिक स्नान एवं कल्पवास आरंभ: 27 अक्टूबर 2026

  • कार्तिक मास समापन (शुक्ल पक्ष पूर्णिमा): 25 नवंबर 2026 (बुधवार)

  • देव दीपावली एवं त्रिपुरारी पूर्णिमा: 25 नवंबर 2026

पूर्णिमांत पंचांग का पालन करने वाले उत्तर भारत के राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा आदि) में कार्तिक मास 27 अक्टूबर से 25 नवंबर तक मान्य होगा। वहीं दक्षिण भारत और गुजरात में अमान्त पंचांग के अनुसार कार्तिक मास का आरंभ दिवाली के अगले दिन यानी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है।

कार्तिक माह में दीपदान का विशेष महात्म्य

कार्तिक महीने का सबसे प्रमुख और अनिवार्य अनुष्ठान 'दीपदान' माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु चार महीनों के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को जागते हैं। इस पूरे माह में अंधकार को दूर करने और ईश्वर के स्वागत के लिए दीपक प्रज्वलित करने का विशेष विधान है।

श्रद्धालुओं को प्रतिदिन सायंकाल में मंदिर, पवित्र नदी के तट, पीपल के वृक्ष, तुलसी के पौधे, घर की चौखट और आकाश के नीचे (आकाश दीप) शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। स्कंद पुराण में कथा आती है कि जो व्यक्ति कार्तिक मास में भगवान विष्णु के मंदिर में या तुलसी के पास दीपक जलाता है, उसके जीवन के कई जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के उपरांत उसे यमराज की यातनाएं नहीं सहनी पड़तीं।

ब्रह्म मुहूर्त में 'कार्तिक स्नान' और कल्पवास का विधान

कार्तिक मास में सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में यानी ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने की परंपरा है। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी, जैसे गंगा, यमुना, सरयू, नर्मदा या गोदावरी में जाकर स्नान करना चाहिए। यदि नदी पर जाना संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल डालकर स्नान करने से भी तीर्थ स्नान के समान पुण्य प्राप्त होता है।

स्नान के उपरांत उगते सूर्य को तांबे के लोटे से अर्घ्य दें और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें। तीर्थ स्थलों पर कल्पवास करने वाले साधक पूरे महीने जमीन पर सोते हैं, दिन में केवल एक बार सात्विक आहार ग्रहण करते हैं और निरंतर भगवद् भजन व श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करते हैं।

तुलसी सेवा और शालिग्राम पूजन का सबसे उत्तम महीना

कार्तिक मास और तुलसी माता का अत्यंत गहरा आध्यात्मिक संबंध है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, तुलसी जी भगवान विष्णु की सबसे प्रिय हैं। इस महीने में तुलसी के पौधे को जल चढ़ाना, उनके चारों ओर परिक्रमा करना, हल्दी-चंदन से तिलक लगाना और संध्या समय उनके समक्ष घी का दीपक जलाना साक्षात माता लक्ष्मी की कृपा को आकर्षित करता है।

कार्तिक शुक्ल नवमी (आंवला नवमी) के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाने और ग्रहण करने का विधान है। इसके साथ ही कार्तिक शुक्ल एकादशी और द्वादशी के दिन भगवान शालिग्राम और माता तुलसी के दिव्य विवाह का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि जो गृहस्थ श्रद्धापूर्वक तुलसी विवाह संपन्न कराते हैं, उन्हें कन्यादान के समान महापुण्य फल की प्राप्ति होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

कार्तिक मास के प्रमुख नियम क्या हैं और क्या नहीं करना चाहिए?

कार्तिक के महीने में तन, मन और भोजन की शुद्धि पर विशेष जोर दिया गया है। शास्त्रों में इस माह के लिए कुछ कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं जिनका पालन हर श्रद्धालु को करना चाहिए:

  1. तामसिक भोजन का त्याग: पूरे कार्तिक मास में मांस, मदिरा, अंडा, लहसुन और प्याज जैसे तामसिक पदार्थों का पूर्ण रूप से निषेध होता है। सात्विक और हल्का भोजन ही ग्रहण करना चाहिए।

  2. बैंगन और दालों से परहेज: आयुर्वेद और धार्मिक नियमों के अनुसार इस महीने में बैंगन, उड़द की दाल, मसूर की दाल और चना खाने की मनाही होती है। विशेष रूप से बैंगन को कार्तिक मास में दूषित माना गया है।

  3. भूमि शयन और ब्रह्मचर्य: जो लोग इस महीने विशेष साधना का संकल्प लेते हैं, उन्हें विलासिता का त्याग कर जमीन पर बिस्तर लगाकर सोना चाहिए और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

  4. द्विदलन और तेल मालिश की मनाही: कार्तिक में शरीर पर प्रतिदिन तेल मालिश करने से बचना चाहिए (केवल नरक चतुर्दशी के दिन तेल मालिश कर स्नान की अनुमति होती है)।

  5. वाणी पर नियंत्रण: किसी की चुगली, परनिंदा, क्रोध और असत्य वचन बोलने से बचें। अपने मन को शांत रखकर नियमित रूप से विष्णु सहस्त्रनाम, गीता के 11वें अध्याय अथवा गजेंद्र मोक्ष का पाठ करें।

कार्तिक मास आत्मिक शुद्धि, सकारात्मक ऊर्जा के संचार और ईश्वर से जुड़ने का सर्वश्रेष्ठ अवसर है। 27 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 25 नवंबर तक चलने वाले इस 30 दिवसीय आध्यात्मिक महापर्व में बताए गए नियमों का पालन कर कोई भी साधक अपने जीवन को सुखमय, निरोगी और पुण्यवान बना सकता है।

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