अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में नहीं किया कोई बदलाव, 4% पर रखा स्थिर; जेरोम पॉवेल के बयान से वैश्विक बाजारों को राहत

वॉशिंगटन/न्यूयॉर्क। वैश्विक वित्तीय बाजारों की सांसें थाम देने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की दो दिवसीय फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) की बैठक संपन्न हो गई है। केंद्रीय बैंक के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने बैठक के बाद आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि फेडरल फंड्स रेट (ब्याज दरों) में कोई बदलाव नहीं किया गया है और इसे 4.00% के मौजूदा दायरे में यथावत बरकरार रखा गया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी की आशंकाओं, अमेरिकी श्रम बाजार (Labor Market) के सुस्त होते आंकड़ों और मुद्रास्फीति के दबावों के बीच फेड के इस कदम को एक संतुलित और सतर्क कदम माना जा रहा है। दुनिया भर के इक्विटी और डेट मार्केट्स के लिए यह एक बड़ी राहत के रूप में सामने आया है, क्योंकि किसी भी अप्रत्याशित दर वृद्धि (Rate Hike) से अंतरराष्ट्रीय लिक्विडिटी पर गंभीर दबाव पड़ने का खतरा मंडरा रहा था।
फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल का रुख: 'वेट एंड वॉच' की नीति पर जोर
पॉलिसी स्टेटमेंट जारी करने के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय बैंक वर्तमान आर्थिक आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण कर रहा है।
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मुद्रास्फीति और 2% का लक्ष्य: पॉवेल ने कहा कि हालांकि मुद्रास्फीति अपने उच्चतम स्तरों से नीचे आई है, लेकिन यह अभी भी फेड के अनिवार्य 2% के दीर्घकालिक लक्ष्य के करीब स्थिर होने की प्रक्रिया में है। जब तक मुद्रास्फीति के टिकाऊ रूप से लक्ष्य की ओर बढ़ने का पूरा भरोसा नहीं मिल जाता, तब तक दरों में आक्रामक कटौती (Aggressive Rate Cut) का जोखिम नहीं उठाया जा सकता।
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आर्थिक विकास और रोजगार बाजार: अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता खर्च स्थिर बना हुआ है, लेकिन नौकरियों के सृजन (Non-Farm Payrolls) की गति पूर्व की तुलना में संतुलित हुई है। ऐसे में दरों को 4% पर रोककर फेड यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अर्थव्यवस्था मंदी (Hard Landing) में न फंसे और एक 'सॉफ्ट लैंडिंग' (Soft Landing) हासिल की जा सके।
वैश्विक और एशियाई बाजारों पर सकारात्मक असर
फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में किसी प्रकार की बढ़ोतरी न करने के फैसले का तुरंत सकारात्मक असर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों पर दिखाई दिया:
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वॉल स्ट्रीट में स्थिरता: फैसले की घोषणा के बाद अमेरिकी बेंचमार्क इंडेक्स एसएंडपी 500 (S&P 500), नैस्डैक (Nasdaq) और डॉव जोन्स (Dow Jones) में निचले स्तरों से रिकवरी देखने को मिली और टेक शेयरों में मजबूती आई।
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अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट: 10-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड (US Treasury Yield) में तात्कालिक नरमी दर्ज की गई, जिससे जोखिम भरे एसेट्स (Equities) के प्रति निवेशकों का आकर्षण फिर से बढ़ा।
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एशियाई बाजारों में हरियाली: टोक्यो का निक्केई 225, हांगकांग का हैंग सेंग और सिंगापुर का स्ट्रेट्स टाइम्स इंडेक्स सकारात्मक रुख के साथ कारोबार करते नजर आए, जिससे यह संकेत मिला कि एशियाई फंड्स से भारी डॉलर आउटफ्लो का तत्काल डर टल गया है।
भारतीय शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था के लिए क्या हैं इसके मायने?
फेडरल रिजर्व के इस फैसले का भारतीय घरेलू अर्थव्यवस्था, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की नीति और दलाल स्ट्रीट (Sensex & Nifty) पर बहुआयामी असर पड़ेगा:
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विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की बिकवाली पर लगाम: पिछले कुछ कारोबारी सत्रों से भारतीय इक्विटी बाजार में विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे थे। फेड द्वारा दरें न बढ़ाने और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में स्थिरता आने से विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली की रफ्तार धीमी हो सकती है, जिससे घरेलू बाजार को सपोर्ट मिलेगा।
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रुपये और कच्चे तेल का संतुलन: अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) पर दबाव कम होने से डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) को मजबूती मिलेगी। मजबूत रुपये के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) और इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात बिल को नियंत्रित रखने में भारत को मदद मिलेगी।
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आरबीआई (RBI) को मिलेगी पॉलिसी में राहत: भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के पास अब अपनी आगामी समीक्षा बैठकों में घरेलू प्राथमिकताओं—जैसे आर्थिक वृद्धि और त्योहारों के बाद मांग के रुझान—के आधार पर फैसले लेने की अधिक स्वायत्तता होगी। फेड की दरों में स्थिरता के चलते भारत में फिलहाल दरों को लेकर किसी अचानक दबाव का सामना नहीं करना पड़ेगा।
फेडरल रिजर्व के इस 'पॉज' (Pause) के बाद अब वैश्विक विश्लेषकों का ध्यान आने वाले महीनों में जारी होने वाले अमेरिकी मुद्रास्फीति और जीडीपी आंकड़ों पर टिक गया है, जो यह तय करेंगे कि 2027 की शुरुआत में दरों में पहली कटौती का रास्ता कब खुलेगा।