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Gajab Raat Review: नेटफ्लिक्स पर मनोज बाजपेयी की सस्पेंस क्राइम थ्रिलर ‘गजब रात’ रिलीज

ओटीटी की दुनिया में संजीदा और परतदार किरदारों को परदे पर जीवंत करने के लिए पहचाने जाने वाले अभिनेता मनोज बाजपेयी एक बार फिर दर्शकों के बीच एक चौंकाने वाले अवतार में लौटे हैं। बहुप्रतीक्षित सस्पेंस क्राइम थ्रिलर फिल्म 'गजब रात' आखिरकार नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो चुकी है। सिनेमा प्रेमियों के बीच यह प्रोजेक्ट काफी समय से चर्चा में था, जिसका बड़ा कारण इसका पुराना विवादित नाम 'घूसखोर पंडत' भी रहा। इस शीर्षक पर कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा विरोध जताए जाने के बाद निर्माताओं ने संवेदनशीलता दिखाते हुए इसका नाम बदलकर 'गजब रात' कर दिया था। अब जब यह फिल्म दर्शकों के सामने आ चुकी है, तो सवाल उठता है कि क्या रितेश शाह के निर्देशन में बनी यह थ्रिलर अपने नाम और मनोज बाजपेयी की मौजूदगी के साथ न्याय कर पाती है या नहीं। 2 घंटे 03 मिनट के रनटाइम में केवल एक रात की घटनाओं के इर्द-गिर्द बुनी गई यह कहानी सिस्टम, रिश्वतखोरी, सत्ता के गलियारों की गंदी राजनीति और इंसानी जमीर के टकराव को परत-दर-परत उघाड़ती है।

होटल की रेड से अस्पताल के षड्यंत्र तक: जानिए क्या है 'गजब रात' की पूरी कहानी

फिल्म की पटकथा दिल्ली की अंधेरी और रहस्यमयी सड़कों पर घूमती है, जहां केंद्र में है भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर अजय निर्वित का किरदार, जिसे मनोज बाजपेयी ने निभाया है। अजय निर्वित एक ऐसा पुलिसिया तंत्र का मोहरा है जिसका कोई नैतिक दायरा नहीं है और जिसके लिए खाकी सिर्फ पैसे ऐंठने और सौदेबाजी का जरिया है। कहानी का आगाज देश की राजधानी के एक होटल में मारे गए छापे से होता है, जहां रोजी नाम की महिला का सामना निर्वित से होता है। रोजी का किरदार नुसरत भरूचा ने निभाया है। निर्वित बिना किसी झिझक के रोजी से मोटी रिश्वत लेकर उसे चुपचाप पिछले दरवाजे से निकाल देता है और बाकी के लोगों को कानूनी शिकंजे में दिखाने के लिए हिरासत में ले लेता है। इसी भ्रष्ट दिनचर्या के बीच शहर में एक सनसनीखेज वारदात घटती है, जब एक तेज रफ्तार कार से लहूलुहान हालत में एक अज्ञात लड़की सड़क पर कूद जाती है। यह मामला जांच के लिए सीधे अजय निर्वित की मेज पर आता है और उस घायल लड़की को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। लेकिन निर्वित की प्राथमिकता न्याय नहीं बल्कि अपनी जेब भरना है। अस्पताल में एक संदिग्ध सीबीआई अफसर की एंट्री होती है, जो इस घायल लड़की को हमेशा के लिए खामोश करने की योजना बनाता है। निर्वित इंसाफ के बजाय उस संदिग्ध अफसर के साथ हाथ मिला लेता है और अस्पताल के भीतर ही उस लड़की को जान से मारने की खूनी साजिश में शामिल हो जाता है। आखिर वह लड़की कौन है, उसके पास कौन से ऐसे राज हैं जिनसे बड़े-बड़े लोग डर रहे हैं, क्या निर्वित अपने नापाक मंसूबों में कामयाब होता है या एक ही रात में कहानी कोई नया मोड़ ले लेती है, पूरी फिल्म इसी रहस्य के इर्द-गिर्द घूमती है।

मनोज बाजपेयी की जबरदस्त एक्टिंग: घूसखोर पुलिसवाले के रोल में फूंकी जान, सपोर्टिंग कास्ट का काम

अभिनय के मोर्चे पर मनोज बाजपेयी एक बार फिर साबित करते हैं कि वे किसी भी कमजोर फ्रेम में भी अपनी अदाकारी से जान फूंकने का हुनर रखते हैं। अजय निर्वित के रूप में उनका बॉडी लैंग्वेज, लालची आंखें और वर्दी के पीछे छिपी शातिराना मुस्कान पूरी तरह स्वाभाविक लगती है। रिश्वत की मांग करते वक्त उनके चेहरे के भाव और बातचीत का अंदाज दर्शकों को स्क्रीन से बांधे रखता है। अक्षय ओबेरॉय और साकिब सलीम ने भी अपने हिस्सों में संतुलित काम किया है और कहानी की गति को सहारा दिया है। पुलिसिया महकमे के माहौल को यथार्थवादी बनाने में राजीव गुप्ता ने अहम भूमिका निभाई है, जिन्होंने ठेठ हरियाणवी लहजे को बहुत ही सधे हुए अंदाज में पकड़ा है और उनकी कॉमिक टाइमिंग कई गंभीर पलों में भी चेहरे पर हल्की मुस्कान लाती है। हालांकि, फिल्म की सबसे बड़ी मायूसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों के स्क्रीन प्रेजेंस को लेकर होती है। दिव्या दत्ता और नुसरत भरूचा जैसी मंझी हुई अभिनेत्रियों को बेहद सीमित स्क्रीनटाइम दिया गया है, जिससे उनके किरदार कहानी में पूरी तरह विकसित होने से पहले ही गायब से हो जाते हैं।

रितेश शाह का निर्देशन और राइटिंग: 2 घंटे 3 मिनट में एक रात का सस्पेंस, कहां चूकी फिल्म

कहानी, पिंक, एयरलिफ्ट और रेड जैसी समीक्षकों द्वारा सराही गई फिल्मों के लेखक के रूप में अपनी पहचान बना चुके रितेश शाह ने 'गजब रात' के साथ निर्देशन की कमान संभाली है। उन्होंने पूरी फिल्म को महज एक रात के 123 मिनट में समेटने का साहसिक प्रयास किया है। निर्देशन का सबसे मजबूत पहलू यह है कि फिल्म की रफ्तार किसी भी मोड़ पर सुस्त नहीं पड़ती और दर्शक लगातार यह जानने के लिए उत्सुक रहता है कि अगले दृश्य में क्या होगा। कहानी कहीं भी बहुत ज्यादा प्रेडिक्टेबल नहीं लगती और सस्पेंस का मीटर लगातार ऊपर-नीचे होता रहता है। हालांकि, रितेश शाह की अपनी पुरानी कल्ट फिल्मों के लेखन से अगर इसकी तुलना करें तो राइटिंग के स्तर पर कुछ साफ झोल नजर आते हैं। सबसे बड़ी तकनीकी और पटकथा की खामी अजय निर्वित के किरदार में अचानक आने वाला बदलाव है। एक ऐसा पुलिसवाला जो जीवन भर सिर्फ पैसे के लिए काम करता रहा और जो चंद घंटों पहले तक एक लड़की की हत्या की साजिश में शामिल था, उसका अचानक एक ही रात में बिना किसी मजबूत और ठोस भावनात्मक आधार के हृदय परिवर्तन हो जाना गले से नीचे नहीं उतरता। इसके अलावा कीकू शारदा और नुसरत भरूचा के किरदारों को केवल संवाद भरने के लिए इस्तेमाल किया गया लगता है। साथ ही फिल्म का मूल नाम 'घूसखोर पंडत' जिस व्यंग्य और तीखेपन को दर्शाता था, वह प्रभाव 'गजब रात' में थोड़ा फीका नजर आता है।

फिल्म की बड़ी खूबियां और कमजोरियां: क्या ओटीटी दर्शकों को पसंद आएगा यह डार्क थ्रिलर

यदि फिल्म के सकारात्मक पहलुओं की बात करें तो इसकी सबसे बड़ी यूएसपी इसका विषय और डार्क टोन है। यह कोई फॉर्मूला बेस्ड पारंपरिक मर्डर मिस्ट्री नहीं है, बल्कि यह एक ही रात की परिधि में सत्ता की हनक, पुलिस विभाग की आंतरिक सड़न, डर्टी पॉलिटिक्स और कॉरपोरेट-क्राइम नेक्सस की कई परतों को एक साथ बेनकाब करती है। सिनेमैटोग्राफी रात के तनावपूर्ण और भयावह माहौल को बखूबी पर्दे पर उतारती है, जिससे रहस्य का माहौल बना रहता है। दूसरी ओर, कमजोरियों की बात करें तो फिल्म का क्लाइमैक्स जिस तरह से समेटा गया है, वह दर्शकों को थोड़ी निराशा दे सकता है। कहानी के कुछ सिरे अंत में बिखरे हुए रह जाते हैं और जिस सस्पेंस को शुरू से बहुत बड़ा बनाकर पेश किया गया था, उसका अंत थोड़ा जल्दबाजी में किया हुआ महसूस होता है। बावजूद इसके, मनोज बाजपेयी का त्रुटिहीन अभिनय और एक रात में घटित होने वाले घटनाक्रम की कसावट इस फिल्म को देखने लायक बनाती है।

यदि आप क्राइम सस्पेंस, रियलिस्टिक सिनेमा और मनोज बाजपेयी के गंभीर किरदारों के मुरीद हैं, तो नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध 'गजब रात' इस वीकेंड एक बार देखने लायक थ्रिलर साबित होती है।

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