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NEET 2026: लाखों छात्रों ने क्रैक की परीक्षा, फिर भी खाली रह गईं MBBS सीटें

देशभर में हर साल लाखों युवा आंखें नम किए और सीने में सपने संजोए मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुटते हैं। दिन-रात एक करके, कोचिंग के चक्कर काटकर और हर एक अंक के लिए संघर्ष करके वे NEET क्वालीफाई भी कर लेते हैं। लेकिन इस साल ऑल इंडिया काउंसलिंग प्रक्रिया के अंतिम चरण के बाद जो तस्वीरें सामने आई हैं, उन्होंने हर किसी को हैरान कर दिया है। लाखों अभ्यर्थियों के पास होने के बावजूद देश भर के मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टर बनने के लिए तय की गई सैकड़ों MBBS सीटें पूरी तरह खाली पड़ी रह गई हैं। एक तरफ जहां छात्र एक-एक सीट के लिए तरसते हैं, वहीं दूसरी तरफ कट-ऑफ क्लियर करने वाले योग्य विद्यार्थी काउंसलिंग सेंटर से बिना दाखिला लिए खाली हाथ लौटने पर मजबूर हो गए हैं। यह स्थिति उन परिवारों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है, जिन्होंने अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने का सपना देखा था।

हताशा की वजह: सालाना 25 से 35 लाख का भारी-भरकम फीस स्ट्रक्चर

इस अभूतपूर्व संकट और खाली सीटों के पीछे जो सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है, वह है डीम्ड यूनिवर्सिटीज और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों का बेतहाशा और बेलगाम फीस स्ट्रक्चर। मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) के अंतिम राउंड की रिपोर्ट दर्शाती है कि तमिलनाडु, पुडुचेरी और देश के अन्य हिस्सों में स्थित निजी संस्थानों में MBBS की एक सीट की ट्यूशन फीस सालाना 23 लाख से 35 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। यदि इसमें हॉस्टल, मेस और अन्य छिपे हुए प्रशासनिक खर्चों को जोड़ दिया जाए, तो साढ़े चार साल की पढ़ाई का कुल बजट 1.25 करोड़ से 1.50 करोड़ रुपये के पार निकल जाता है। मध्यमवर्गीय या साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों के लिए इतनी बड़ी रकम चुकाना पूरी तरह असंभव है। बैंक लोन की सीमाएं भी इतनी बड़ी राशि को कवर नहीं कर पातीं, जिसके कारण मेरिट में आने के बावजूद योग्य छात्रों को अपनी सीटें छोड़नी पड़ रही हैं।

आंकड़ों की जुबानी: काउंसलिंग के अंतिम दौर के बाद भी 800 से अधिक सीटें खाली

अगर आंकड़ों पर गौर करें तो इस साल नीट यूजी की प्रक्रिया समाप्त होने के मोड़ पर खड़ी है, लेकिन मेडिकल कॉलेजों का आंकड़ा चिंताजनक है। रिपोर्टों के अनुसार, स्ट्रे वैकेंसी और ऑल इंडिया कोटा के अंतिम राउंड के बाद भी देशभर में 830 से अधिक MBBS सीटें बिना एडमिशन के खाली रह गई हैं। अकेले तमिलनाडु और पुडुचेरी के डीम्ड विश्वविद्यालयों में ही 824 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जिन पर कोई भी छात्र मोटी फीस के डर से दाखिला लेने नहीं पहुंचा। कई प्रसिद्ध संस्थानों में जहां पहले तीसरी राउंड में ही सारी सीटें भर जाती थीं, वहां इस बार कट-ऑफ रैंक में भारी गिरावट के बावजूद सीटें खाली रहीं। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि छात्र अब केवल डिग्री पाने के लिए खुद को और अपने परिवार को जीवनभर के वित्तीय कर्ज में धकेलने के लिए तैयार नहीं हैं।

क्या अतिरिक्त काउंसलिंग राउंड से सुलझेगी छात्रों की परेशानी?

सीटें खाली रह जाने के बाद अब अभ्यर्थियों और अभिभावकों की नजरें मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) और स्वास्थ्य मंत्रालय के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार इन खाली सीटों को भरने के लिए कोई विशेष स्ट्रे वैकेंसी राउंड आयोजित करेगी? हालांकि, जानकारों और शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस पर कोई राष्ट्रीय नीति या कैपिंग लागू नहीं की जाती, तब तक अतिरिक्त काउंसलिंग कराने से भी जमीनी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आने वाला है। अगर फीस वही रही, तो छात्र फिर से प्रवेश लेने से कतराएंगे। कई छात्र संगठनों ने भी मांग उठाई है कि केंद्र सरकार को डीम्ड विश्वविद्यालयों की फीस तय करने के लिए तुरंत कड़े नियम बनाने चाहिए ताकि देश के होनहार युवाओं को अपनी प्रतिभा के दम पर पढ़ाई करने का जायज मौका मिल सके।

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