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इस्तीफा देकर उपचुनाव कराने वाले विधायकों से वसूला जाए खर्च? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और ECI को भेजा नोटिस

नई दिल्ली/विशेष संवाददाता। राजनीतिक लाभ या पाला बदलने के लिए विधानसभा सदस्यता से अचानक इस्तीफा देने और फिर उसी सीट पर उपचुनाव लड़ने वाले जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने को लेकर देश की शीर्ष अदालत में एक ऐतिहासिक कानूनी बहस शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है, जिसमें मांग की गई है कि यदि कोई विधायक बिना किसी वैध या ठोस कारण के अपनी सीट से इस्तीफा देता है और उसकी वजह से दोबारा चुनाव कराना पड़ता है, तो उस उपचुनाव का पूरा सरकारी खर्च संबंधित विधायक से ही वसूला जाए।

सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के बाद राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर करदाताओं की गाढ़ी कमाई के दुरुपयोग और जनादेश के साथ होने वाले खिलवाड़ से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने किन पक्षों से मांगा जवाब

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने की, जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल रहे। पीठ ने याचिका में उठाए गए संवैधानिक और वित्तीय सवालों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग, तमिलनाडु के मुख्य निर्वाचन अधिकारी तथा तमिलनाडु में इस्तीफा देने वाले छह पूर्व विधायकों को नोटिस जारी कर उनका आधिकारिक पक्ष मांगा है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक धन की सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया की शुचिता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, जिसके चलते सभी पक्षों का रुख जानना अनिवार्य हो जाता है।

याचिकाकर्ता की मुख्य मांगें और 'चुनाव व्यय सुरक्षा' का मॉडल

यह याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता के. सुथन की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारत में आम चुनाव या उपचुनाव कराने में भारी-भरकम प्रशासनिक मशीनरी, सुरक्षा बल और सरकारी खजाने का पैसा खर्च होता है। जब कोई नेता अपने निजी राजनीतिक स्वार्थ के लिए कार्यकाल के बीच में बिना किसी आपात या अपरिहार्य स्थिति के इस्तीफा देता है, तो उस सीट के लाखों मतदाताओं और देश के करदाताओं पर उपचुनाव का अनावश्यक बोझ लाद दिया जाता है।

याचिका में अदालत से एक सख्त व्यवस्था बनाने का आग्रह किया गया है, जिसके तहत:

  • चुनावी खर्च की अग्रिम वसूली: बिना ठोस कानूनी आधार के इस्तीफा देने वाले विधायकों से उपचुनाव पर आने वाले पूरे प्रशासनिक खर्च की वसूली की जाए। यदि वे दोबारा चुनाव लड़ना चाहते हैं, तो उनसे चुनाव व्यय सुरक्षा के रूप में खर्च के बराबर की राशि पहले ही जमा कराई जाए।

  • पांच साल की अयोग्यता: बिना जायज वजह सदस्यता छोड़ने वाले नेताओं को कम से कम पांच साल की अवधि के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए, ताकि दल-बदल और कृत्रिम राजनीतिक संकट पर लगाम लग सके।

  • 2004 की चुनाव आयोग सिफारिशों का हवाला: याचिका में निर्वाचन आयोग द्वारा 2004 में दिए गए उस सुझाव का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें अपनी मर्जी से सीट खाली कर उपचुनाव की स्थिति पैदा करने वालों से लागत वसूलने पर विचार करने की बात कही गई थी।

मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को दी गई है सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंचा है, बल्कि मद्रास हाईकोर्ट के 24 सितंबर के आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) के जरिए शीर्ष अदालत के सामने आया है। मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस. ए. धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि किसी विधायी सीट से इस्तीफा देने का अधिकार सदन की सदस्यता को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक योजना का हिस्सा है।

हाईकोर्ट का मानना था कि न्यायिक आदेश के जरिए विधायकों पर कोई अतिरिक्त-वैधानिक वित्तीय या दंडात्मक प्रतिबंध नहीं थोपा जा सकता। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि चुनाव खर्च की वसूली के लिए नया नियम तय करना या नई अयोग्यताएं लागू करना संसद और विधायी नीति का काम है, अदालतें कानून बना नहीं सकतीं बल्कि सिर्फ व्याख्या कर सकती हैं। याचिकाकर्ता ने इसी कानूनी व्याख्या को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च अदालत जनता के पैसे की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश जारी करने में पूरी तरह सक्षम है।

तमिलनाडु के छह विधायकों के इस्तीफे से उपजा था पूरा विवाद

इस कानूनी लड़ाई की जड़ें तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद हुए राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ी हैं। याचिका के अनुसार, चुनाव नतीजे आने के कुछ ही समय बाद अन्नाद्रमुक (AIADMK) के छह निर्वाचित विधायकों ने अपनी विधानसभा सीटों से इस्तीफा दे दिया और सत्तारूढ़ दल का दामन थाम लिया। आरोप है कि इन विधायकों ने अपने खिलाफ चल रही दल-बदल या व्हिप उल्लंघन की अयोग्यता कार्यवाहियों से बचने और नए दल के टिकट पर फिर से मैदान में उतरने के लिए इस्तीफे का रास्ता चुना।

याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि जब कोई प्रतिनिधि पूरे पांच साल के लिए जनता का विश्वास हासिल करता है, तो क्या वह निजी महत्वाकांक्षा के चलते कार्यकाल को बीच में ही छोड़कर सरकारी खजाने पर करोड़ों रुपये के दोबारा मतदान का खर्च थोपने के लिए स्वतंत्र है? अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद देश में चुनाव सुधारों और नेताओं की वित्तीय जवाबदेही को लेकर एक नई और बेहद दूरगामी कानूनी बहस की नींव पड़ चुकी है।

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